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26 सितंबर 2020

हिन्दी साहित्य के परीक्षोपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य जो प्रतियोगी परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी हैं---–-


  • 1.आचार्य शुक्ल ने आदिकाल में देशभाषा काव्य में कितनी पुस्तकों की संख्या मानी है~~8
  • 2.” जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब ही साहित्य हैं “यह माना है~~ शुक्ल
  • 3.” भाषा सर्वेक्षण “के रचयिता है~~ जॉर्ज ग्रियर्सन
  • 4. पृथ्वीराज रासो कितने प्रकार के छंदों में लिखा गया है~~68
  • 5. उपदेश रसायन रास के रचयिता है~~ जिनदत्त सूरी
  • 6.पृथ्वीराज रासो काव्य किस कोटि का है~~वीरगाथा महाकाव्य
  • 7.”हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास ” ग्रंथ के लेखक है~~ रामकुमार वर्मा
  • 8.इतिहास लेखन की सबसे विकसित पद्धति है ~~विधेयवादी पद्धति
  • 9. विद्यापति ने कीर्तिलता को किस संवाद रूप में लिखा है ~~भृंग-भृंगी
  • 10.” राठौड़ा री ख्यात” के रचयिता है ~~दयालदास
  • 11. नाथों में “रसायनी” कौन थे ~~नागार्जुन
  • 12. कविराज श्यामलदास तथा काशी प्रसाद जायसवाल ने रासो की उत्पत्ति मानी है~~ रहस्य से
  • 13. “आध्यात्मिक रंग के चश्मे आजकल बहुत सस्ते हो गए हैं उन्हें चढ़ाकर कुछ लोगों ने गीतगोविंद के पद्यों को आध्यात्मिक संकेत बताया है वैसे ही विद्यापति के पद्यों को भी”- पंक्ति है ~~आचार्य शुक्ल
  • 14.काफिर बोध, पंचअग्नि, दयाबोध,अष्ट चक्र व रसराह ग्रंथ है ~~गोरखनाथ
  • 15. कयमास वध किस रचना का खंड है~~ पृथ्वीराज रासो
  • 16. उक्ति व्यक्ति प्रकरण के रचयिता है~~ दामोदर शर्मा
  • 17. “मनहुं कला ससीभान कला सोलह सो बनिय “- पंक्ति है~~ चंदबरदाई
  • 18. “राउलबेल”श्रृंगार परक चंपू काव्य के रचयिता है ~~रोडा कवि
  • 19. अपभ्रंश भाषा का प्रथम कवि माना जाता है ~~स्वयंभू
  • 20. स्वयं को ‘अभिमान मेरु’ कहा करते थे~~ पुष्पदंत

  • 21. आदिकाल को संधिकाल एवं चारण काल किसने कहा ~~रामकुमार वर्मा
  • 22. बौद्ध सिद्धों के पदों और दोहों को ‘ बौद्धगान ओ दोहा’ नाम से बांग्ला भाषा मे प्रकाशित किया~~ पंडित हरप्रसाद शास्त्री
  • 23. किरान- उस- सादेन रचना है ~~अमीर खुसरो
  • 24. ‘पुरुष परीक्षा’ किसकी संस्कृत में रचित रचना है~~ विद्यापति
  • 25. रिठेमणि चरिउ के रचयिता है~~ स्वयंभू
  • 26. कीर्तिलता की भाषा है ~~अवहट्ट
  • 27.भू- परिक्रमा के रचयिता है ~~विद्यापति
  • 28. जयमयंक जस चंद्रिका के रचयिता है~~ मधुकर कवि
  • 29. इयाश्रय काव्य की रचना की है~~ हेमचंद्र
  • 30. ‘कुमारपाल प्रतिबोध’ गद्य पद्य में प्राकृत काव्य लिखा है~~ सोमप्रभ सुरि

  • 31. गोरखनाथ में किसके योग का सहारा लेकर ‘हठयोग’ का प्रवर्तन किया~~ पतंजलि
  • 32. ‘रत्नाकर जोपम कथा’ किस संप्रदाय का मानक ग्रंथ है~~ सिद्धों का
  • 33.” जिमि लोण बिलिज्जई पाणी एहि तिमि धरणी लई चित्त” कथन है ~~कणहप्पा
  • 34. “गंगा जऊना माझे बहई रे नाइ”है- उक्ति है~~ डोम्भीपा
  • 35. “काआ तरुवर पंच बिड़ाल” उक्ति है~~ लुइपा
  • 36. सिद्धों में सबसे पुराने माने जाते हैं~~ सरहपा
  • 37. अपभ्रंश नाम पहले-पहल किस के शिलालेख में मिलता है~~ वल्लभी राजा धारसेन द्वितीय
  • 38. “उस समय जैसे ‘गाथा’ या ‘गाहा’ कहने से प्राकृत का बोध होता था वैसे ही दोहा या दूहा कहने से अपभ्रंश का” कथन के लेखक है~~ रामचंद्र शुक्ल
  • 39. ‘देशी नाममाला’ किसकी रचना है~~ हेमचंद्र
  • 40. हजारी प्रसाद द्विवेदी, विश्वनाथ प्रसाद मिश्र तथा चंद्रबली पांडेय ने रासो की उत्पत्ति मानी है~~ रासक

  • 41. हरप्रसाद शास्त्री ने रासो की उत्पत्ति मानी है~~ राजयश
  • 42.आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रासो की उत्पत्ति मानी है ~~रसायण
  • 43. पृथ्वीराज रासो की रचना विधान में सर्वाधिक विवादास्पद पक्ष है~~ ऐतिहासिकता
  • 44. ‘कन कंड चरिउ’ के रचयिता है~~ कनकामर मुनि
  • 45.’प्राकृत प्रकाश’ के रचयिता ~~वररुचि
  • 46. ढोला मारु रा दुहा के रचयिता~~ कुशललाभ
  • 47. सबसे पहले बारहमासा वर्णन किस रचना में मिलता है ~~बीसलदेव रासो 
  • 48. आदिकाल को अपभ्रंश काल कहा ~~धीरेंद्र वर्मा
  • 49. बारह बरीस लौ कूकर जीवे, और तेरह लौ जिये सियार।
  • बरिस अठारह छत्री जीवे, आगे जीवन को धिक्कार।। उक्त पंक्ति है~~जगनिक
  • 50. आदिकाल को ‘बीजवपन काल’ कहा है~~महावीर प्रसाद द्विवेदी

  • 51. दोहाकोश किसकी रचना है ~~सरहपा
  • 52. मैथिल कोकिल कहे जाते हैं ~~विद्यापति
  • 53.रणमल छंद की रचना की~~ श्रीधर
  • 54. आल्हाखंड नाम से कौन सी रचना प्रसिद्ध है~~ परमाल रासो
  • 55. “पद्मावती समय” किस रचना का खंड है~~ पृथ्वीराज रासो
  • 56. राजमती और बीसलदेव की कथा किस ग्रंथ में है~~ बीसलदेव रासो
  • 57.वर्ण रत्नाकर ग्रंथ के रचयिता है~~ ज्योतिरीश्वर
  • 58. नाथ- संप्रदाय के रचयिता है~~ हजारी प्रसाद द्विवेदी
  • 59. शिलांकित चंपू गेय काव्य रचना है~ राउलबेल
  • 60. दो सुखने, खलिकबारी आदि रचनाएं हैं~ अमीर खुसरो

  • 61. प्राण-संकली,सबदी, नरवैबोध, आत्मबोध और पंचमात्रा रचनाएं हैं~~ गोरखनाथ
  • 62.गोरखनाथ की रचनाओं को ‘गोरखबानी’ नाम से संपादित किया ~~पीतांबर दत्त बड़थ्वाल
  • 63.”पुस्तक जल्हण हत्थ दै, चलि गज़्ज़न नृज काज” पंक्ति है~ जल्हण
  • 64. ‘चन्द हिंदी के प्रथम महाकवि माने जाते हैं और इनका पृथ्वीराज रासो हिंदी का प्रथम महाकाव्य है’ कथन के लेखक है~~ आचार्य शुक्ल
  • 65.’पृथ्वीराज रासो’ को डॉक्टर श्यामसुंदर दास, मोहनलाल विष्णु लाल पंड्या, मिश्र बंधुओं एवं कर्नल टॉड मानते हैं~~ प्रामाणिक
  • 66.हजारी प्रसाद द्विवेदी, मुनि जिन विजय, सुनीति कुमार चटर्जी आदि ‘पृथ्वीराज रासो’ को मानते हैं~~ अर्धप्रमाणिक
  • 67.पृथ्वीराज रासो में कितने सर्ग या समय है~~69
  • 68.”बज़्ज़िय घोर निसान रान चौहान चहुँ दिसि” पंक्ति है~~ चंदबरदई
  • 69. संदेश रासक किस प्रकार का काव्य है~~ खंडकाव्य
  • 70. पृथ्वीराज रासो को पूरा किया था~~ जल्हण ने

  • 71.’परमात्म-प्रकाश’ और ‘योगसार’ किसकी रचना है~~ जोइंदु
  • 72. पाहुड़दोहा के रचयिता है~~ मुनि रामसिंह
  • 73. सरहपाद,सरोजवज्र व राहुलभद्र आदि नामों से कौन जाना जाता है~`सरहपा
  • 74.अक्षरद्विकोपदेश,डोम्बिगीतिका व योगचार्य किसकी रचनाएं हैं~~डोम्बिपा
  • 75. ‘श्रावकाचार’ व दब्ब-सहाव-पयास, लघुनयचक्र और दर्शनसार ग्रन्थ है~~देवसेन
  • 76. भरतेश्वर-बाहुबली रास खंड काव्य ग्रंथ लिखा~~ शालिभद्र सूरी
  • 77. ‘स्थूलीभद्र रास’ किसकी रचना है~~ जिनधर्म सुरि
  • 78. रेवंतगिरी रास रचना है ~~विजयसेन सुरि
  • 79. ‘नेमिनाथ रास’ नामक ग्रंथ की 58 छंदों में रचना की~~सुमतिगणि
  • 80. नाथ संप्रदाय को ‘अवधूत संप्रदाय’, ‘योग संप्रदाय’ कहा है~~ हजारी प्रसाद द्विवेदी

  • 81. डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा किस रचना में हिंदी साहित्य को अखिल भारतीय साहित्य से सम्बद्ध करने का प्रयास हुआ है~~ हिंदी साहित्य की भूमिका
  • 82.’आधुनिक हिंदी साहित्य का विकास’ किसके द्वारा लिखित है~~ श्री कृष्णलाल
  • 83.’हिंदी पुस्तक साहित्य’ को आधुनिक साहित्य संपत्ति का बीजक किसने कहा है~~ डॉ• माता प्रसाद गुप्त
  • 84.’हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास’ लिखा गया~~ डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी
  • 85.’हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास’ में संपूर्ण इतिहास को डॉ. गणपति चंद्र गुप्त ने कितने काल खंडों में विभाजित किया है~~ आदिकाल, मध्यकाल और आधुनिक काल
  • 86.हिंदी साहित्य का सर्वाधिक व्यवस्थित और प्रथम इतिहास है~~ हिंदी साहित्य का इतिहास(शुक्ल)
  • 87.अपभ्रंश साहित्य को हिंदी साहित्य से अलग मानकर उसे पूर्व पीठिका के रूप में किसने प्रस्तुत किया ~~आचार्य शुक्ल
  • 88.आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने काल विभाजन का प्रधान आधार क्या माना~~ जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन को
  • 89.शुक्ल कृत हिंदी साहित्य का इतिहास में आदिकाल का नाम जो सर्वाधिक विवादास्पद रहा ~~वीरगाथाकाल
  • 90.’हिंदी के मुसलमान कवि’ नामक पुस्तक के लेखक है~~ गंगा प्रसाद सिंह

  • 91.हिंदी साहित्य का कौनसा इतिहास ग्रंथ एक पुस्तक के रूप में सबसे बड़ा है~~ हिंदी साहित्य का इतिहास (रमाशंकर शुक्ल रसाल)
  • 92.राजस्थानी साहित्य की रूपरेखा के लेखक हैं~~ मोतीलाल मेनारिया
  • 93.हिंदी साहित्य इतिहास में दोहरे नामकरण की प्रवृत्ति का आरंभ किसने किया~~ आचार्य शुक्ल
  • 94.हजारी प्रसाद द्विवेदी का कौनसा ग्रंथ एक व्याख्यान ग्रंथ है~~ हिंदी साहित्य का आदिकाल
  • 95.अपभ्रंश को पुरानी हिंदी माना~~ चंद्रधर शर्मा गुलेरी
  • 96.आचार्य शुक्ल ने आदिकाल के कितने ग्रंथों को प्रामाणिक माना है ~~12
  • 97.’द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान’ किसके द्वारा रचित है जिसमें केवल हिंदी कवियों का उल्लेख है~~ ग्रियर्सन
  • 98.द मार्डन वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान सन 1888 में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल की पत्रिका के रूप में प्रकाशित हुआ
  • 99.हिंदी साहित्य के इतिहास में काल विभाजन का सर्वप्रथम प्रयास किया~~ग्रियर्सन
  • 100.’तज़किरा-ई-शुअराई हिंदी’ किसके द्वारा रचित इतिहास ग्रंथ है~~ मौलवी करीमुद्दीन

हिन्दी साहित्य में सर्वप्रथम कौन , क्या, कैसे ????

 हिन्दी साहित्य में सर्वप्रथम योगदान या उपलब्धि संबंधी तथ्यों का काफी महत्व है। इस तरह के प्रश्न स्कूल, कॉलेज या प्रतियोगी परीक्षाओं मे अक्सर पूछे जाते रहे हैं  ------
  • 1. अपभ्रंश के प्रथम महाकवि  - स्वयंभू
  • 2.अपभ्रंश का प्रथम कड़वक बद्ध- पउम चरित्र -  स्वयंभू 
  • 3.अपभ्रंश के प्रथम ऐतिहासिक वैयाकरण - हेमचंद्र
  • 4.हिंदी के प्रथम कवि - सरहपा 
  • 5.हिंदी में दोहा चौपाई का सर्वप्रथम प्रयोग- सरहपा
  • 6.हिंदी की प्रथम रचना- श्रावकाचार देवसेन कृत
  • 7. हिंदी साहित्य की प्रथम रचना - पृथ्वीराज रासो चंद्र बरदाई
  • 8. हिंदी साहित्य का प्रथम महाकाव्य- पृथ्वीराज रासो
  • 9. हिंदी काव्य में प्रथम बारहमासा वर्णन - बीसलदेव रासो
  • 10. किसी भारतीय भाषा में रचित इस्लाम धर्मावलंबी कवि की प्रथम रचना- संदेश रासक (अब्दुल रहमान)
  • 11. अवहट्ठ का सर्वप्रथम प्रयोग- विद्यापति ने कीर्तिलता में
  • 12. हिंदी के सर्वप्रथम गीतकार - विद्यापति
  • 13. हिंदी में सर्वप्रथम मुकरियों की शुरुआत - अमीर खुसरो
  • 14. भक्ति के प्रवर्तक - रामानुजाचार्य
  • 15. हिंदी के प्रथम सूफी कवि - असायत
  • 16. सूफी प्रेमाख्यान का प्रथम काव्य- हंसावली असायत
  • 17. हिंदी का प्रथम बड़ा महाकाव्य - हंसावली( असायत )
  • 18.हिंदी का प्रथम वक्रोति कथात्मक महाकाव्य- पद्मावत
  • 19. हिंदी की आदि कवियत्री - मीराबाई
  • 20. कृष्ण भक्ति काव्य का सबसे प्रसिद्ध काव्य- सूरसागर (सूरदास)
  • 21. राम भक्ति का सबसे प्रसिद्ध काव्य- रामचरितमानस (तुलसीदास )
  • 22.भक्तिकाल को काव्य का स्वर्ण युग घोषित करने वाला प्रथम व्यक्ति -जॉर्ज ग्रियर्सन
  • 23. सर्वप्रथम सतसई परंपरा का आरंभ - तुलसी सतसई
  • ( अधिकांश कृपाराम की हित तरंगिणी को मानते हैं)
  • 24. रीति काव्य का सर्वप्रथम ग्रंथ -हित तरंगिणी -कृपाराम
  • 25. खड़ी बोली में लिखित सर्वप्रथम काव्य ग्रंथ -श्रीधर पाठक द्वारा अनुवादित( हरमिट)-एकांतवासी योगी
  • 26. खड़ी बोली के प्रथम स्वच्छंदतावादी कवि- श्रीधर पाठक
  • 27. खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य -प्रियप्रवास- हरिऔंध
  • 28. गीतिकाव्य शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग -लोचन प्रसाद पांडेय ने कुसुमनमाला की भूमिका में
  • 29. छायावाद की प्रथम कृति -झरना 1918 प्रसाद
  • 30. शुक्लानुसार छायावाद का प्रथम प्रतिनिधि कवि- पंत
  • 31. मुक्तछंद का प्रथम प्रयोगकर्ता -निराला -जूही की कली में
  • 32.निराला की प्रथम कविता -जूही की कली -1916
  • 33. प्रयोगवाद शब्द का प्रथम प्रयोग -नंददुलारे वाजपेई
  • 34.नई कविता नाम दिया -अज्ञेय ने
  • 35. अज्ञेय की प्रथम काव्य कृति -भग्न दूत 1933
  • 36. प्रेमचंद का प्रथम उपन्यास- प्रेमा अर्थात दो सखियों का विवाह 1907 हम खुर्मा व हम सवाब का हिंदी रुपांतर
  • 37. हिंदी का प्रथम उपन्यास -परीक्षा गुरु लाला श्रीनिवास दास कृत
  • 38. प्रेमचंद का मूल रूप से हिंदी में लिखित प्रथम उपन्यास -कायाकल्प 1926
  • 39 जैनेंद्र का प्रथम उपन्यास-परख 1929
  • 40. इलाचंद्र जोशी का प्रथम उपन्यास -घृणामयी 1929
  • 41. भगवती चरण वर्मा का प्रथम उपन्यास- चित्रलेखा 1934
  • 42. अज्ञेय का प्रथम उपन्यास- शेखर एक जीवनी 1941
  • 43. रेणु का प्रथम उपन्यास -मैला अंचल 1954
  • 44.निर्मल वर्मा का प्रथम उपन्यास -वे दिन 1964
  • 45. हिंदी की प्रथम मौलिक कहानी -इंदुमती - किशोरीलाल
  • 46.हिंदी की प्रथम कहानी लेखिका -बंग महिला( राजेंद्र बाला घोष)
  • कहानी -दुलाई वाली
  • 47. प्रसाद की प्रथम कहानी -ग्राम 1911(इंदु पत्रिका में published)
  • 48 प्रेमचंद की प्रथम कहानी- पंच परमेश्वर 1916
  • 49.निर्मल वर्मा का प्रथम कहानी संग्रह - परिदें 1960
  • 50. कमलेश्वर का प्रथम कहानी संग्रह -राजा निरबंसिया 1957
  • 51. हिंदी का प्रथम मौलिक नाटक - (भारतेंदु ने माना) नहुष -गोपाल चंद्र
  • √√आनंद रघुनन्दन -प्राणचंद चौहान
  • 52. हिंदी का प्रथम अभिनीत नाटक -जानकी मंगल (शीतला प्रसाद खत्री)
  • 53. प्रसाद का प्रथम ऐतिहासिक नाटक -राज्यश्री 1915
  • 54. हिंदी का प्रथम एकांकी -एक घूंट (प्रसाद)
  • 55. आचार्य रामचंद्र शुक्ल की पहली सैद्धांतिक आलोचना कृति -काव्य में रहस्यवाद
  • 56. रस विवेचन को पहली बार मनोवैज्ञानिक आधार प्रदान किया -रामचंद्र शुक्ल ने
  • 57. हिंदी में साधारणीकरण के संबंध में पहला चिंतन- रामचंद्र शुक्ल
  • 58.साधारणीकरण का प्रथम प्रयोगकर्ता -भट्टनायक
  • 59. हिंदी में प्रथम आत्मकथा -अर्द्धकथानक 1641 -बनारसीदास जैन
  • 60. हिंदी में प्रथम जीवनी -भक्तमाल -1585 नाभादास
  • (प्रथम मौलिक जीवनी लेखक -कार्तिक प्रसाद खत्री -
  • मीराबाई का जीवन चरित्र -1883
  • अहल्या बाई का जीवन चरित्र-1889)
  • 61. हिंदी में प्रथम संस्मरण -हरिऔंध का संस्मरण (बालमुकुंद गुप्त)
  • 62. हिंदी में प्रथम रेखाचित्र -पदम पराग (1929 )पदम सिंह शर्मा
  • 63. हिंदी में प्रथम यात्रा वृतांत- लंदन यात्रा 1883 श्रीमती हर देवी
  • 64. हिंदी में प्रथम रिपोर्ताज -लक्ष्मीपुरा -1938 शिवदान सिंह चौहान
  • 65. हिंदी गद्य काव्य की प्रथम रचना- साधना (राय कृष्णदास)
  • 69. हिंदी साहित्य इतिहास का प्रथम व्यवस्थित ग्रंथ- हिंदी साहित्य का इतिहास( रामचंद्र शुक्ल)
  • 70. परंपरा की दृष्टि से रचित हिंदी साहित्य इतिहास का प्रथम ग्रंथ -हिंदी साहित्य की भूमिका (हजारी प्रसाद द्विवेदी)
  • 71. साहित्य इतिहास का प्रथम मार्क्सवादी ग्रंथ कार- रामविलास शर्मा
  • 72. खड़ी बोली पद्य का प्रथम प्रयोगकर्ता अमीर- खुसरो
  • 73. खड़ी बोली की प्रथम गद्य रचना -चंद छंद बरनन की महिमा गंग कवि
  • 74. खड़ी बोली में साहित्य स्वरूप का सर्वप्रथम प्रयोग किया- रामप्रसाद निरंजनी ने योग- भाषा वशिष्ठ में
  • 75.किसी भारतीय द्वारा देशी भाषा में प्रकाशित प्रथम पत्र- संवाद कौमुदी 1821 सं.राजा राममोहन राय
  • 76. प्रथम हिंदी पत्र -उदंत मार्तंड 30 मई 1826
  • 77. सर्वप्रथम हिंदी दैनिक पत्र- समाचार सुधा वर्षण 1854
  • 78. हिंदी की प्रथम लघु पत्रिका -नए पत्ते -लक्ष्मीकांत वर्मा
  • 79. हिंदी में प्रकाशित प्रथम ग्रंथावली -भारतेंदु ग्रंथावली
  • 80. हिंदी के लिए प्रथम साहित्य अकादमी पुरस्कार- हिम तरंगिनी माखनलाल चतुर्वेदी 1955
  • 81. ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रथम हिंदी साहित्यकार पंत - 1968 चिदम्बरा
  • 82. ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रथम हिंदी महिला साहित्यकार -महादेवी वर्मा यामा -1982
  • 83. प्रथम व्यास सम्मान -भारत के भाषा परिवार और हिंदी( डॉक्टर रामविलास शर्मा 1991)
  • 84. प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन -नागपुर -1975
  • 85. एम.ए .हिंदी का सर्वप्रथम शिक्षण प्रारंभ हुआ- काशी हिंदू विश्वविद्यालय में 1921
  • 86. काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रथम हिंदी विभागाध्यक्ष -श्यामसुंदर दास
  • 87. साहित्य अकादमी का प्रथम अध्यक्ष- पंडित जवाहरलाल नेहरु
  • 88. हिंदी साहित्य परिषद का प्रथम अध्यक्ष -पुरुषोत्तम दास टंडन
  • 89. संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी में भाषण देने वाला प्रथम व्यक्ति- अटल बिहारी वाजपेई 1977
  • 90. हिंदी भाषा का प्रथम वैज्ञानिक इतिहास -हिंदी भाषा का इतिहास 1933- धीरेंद्र वर्मा
  • 91-हिन्दी का पहला स्वतन्त्र मौलिक निबंध -राजा भोज का सपना 
  • (राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द)
  • 92- प्राचीनतम गद्य - पद्य(चम्पू )काव्य -राउरवेळ -रोड़ा कवि 
  • 93.ब्रजभाषा गद्य की प्रथम रचना -शृंगार रस मंडन -गोंसाई विट्ठलनाथ
  • 94.आधुनिक खड़ी बोली हिंदी गद्य का जनक -भारतेन्दु
  • 95--हिन्दी की पहली वैज्ञानिक कहानी -चन्द्र लोक की यात्रा
  • 96-फ्लेश बैक पद्धति आधारित प्रथम कहानी -उसने कहा था
  • 97.नवगीत परम्परा के सूत्रधार-अज्ञेय
  • आधार प्रवर्तक -राजेंद्र प्रसाद सिंह
  • 98 .हिन्दी आलोचना के प्रवर्तक - भारतेंदु
  • 99.हिन्दी के प्रथम लक्षण ग्रंथकार -केशवदास
  • 100.हिन्दी में रामभक्ति साहित्य सम्बन्धी प्रथम काव्य रचना -रामरक्षा स्त्रोत (रामानंद)

21 सितंबर 2020


02 सितंबर 2020

शब्द - शक्ति

शब्द-शक्ति 

शब्द का अर्थ बोध करानेवाली शक्ति 'शब्द शक्ति' कहलाती है।
शब्द-शक्ति को संक्षेप में 'शक्ति' कहते हैं। इसे 'वृत्ति' या 'व्यापार' भी कहा जाता है।

सरल शब्दों में- मिठाई या चाट का नाम सुनते ही मुँह में पानी भर आता है। साँप या भूत का नाम सुनते ही मन में भय का संचार हो जाता है। यह प्रभाव अर्थगत है। अतः जिस शक्ति के द्वारा शब्द का अर्थगत प्रभाव पड़ता है वह शब्दशक्ति है।

काव्य में रस का संचार शब्द-शक्तियों के द्वारा होता हैं। यहाँ शब्दों का विशेष महत्त्व माना गया हैं। काव्य-भाषा में वाक्यों की रचना इस बात की सूचक हैं कि उसमें अनेक प्रकार के शब्दों का प्रयोग प्रकरण, प्रसंग और कवि-आशय के अनुसार हुआ हैं। कवियों की कृतियों में शब्दों के अनेक अर्थ ढूँढने की प्रथा उचित नहीं कही जा सकती। देखना यह चाहिए कि कवि ने शब्दों का प्रयोग कर जिन अभीष्ट अर्थों को रखना चाहा हैं, उसमें वह कहाँ तक सफल हुआ हैं।

तात्पर्य यह हैं कि 'शब्द की शक्ति उसके अन्तर्निहित अर्थ को व्यक्त करने का व्यापार हैं।'' अर्थ का बोध कराने में 'शब्द' कारण हैं और अर्थ का बोध कराने वाले व्यापार को शब्द-शक्ति कहते हैं। आचार्य मम्मट ने व्यापार शब्द का और आचार्य विश्वनाथ ने शक्ति शब्द का प्रयोग किया हैं।

हिन्दी के रीतिकालीन आचार्य चिन्तामणि ने लिखा है कि ''जो सुन पड़े सो शब्द है, समुझि परै सो अर्थ'' अर्थात जो सुनाई पड़े वह शब्द है तथा उसे सुनकर जो समझ में आवे वह उसका अर्थ है। स्पष्ट है कि जो ध्वनि हमें सुनाई पड़ती है वह 'शब्द' है, और उस ध्वनि से हम जो संकेत या मतलब ग्रहण करते है वह उसका 'अर्थ' है।

शब्द से अर्थ का बोध होता है। अतः शब्द हुआ 'बोधक' (बोध करानेवाला) और अर्थ हुआ 'बोध्य' (जिसका बोध कराया जाये)।

जितने प्रकार के शब्द होंगे उतने ही प्रकार की शक्तियाँ होंगी। शब्द तीन प्रकार के- वाचक, लक्षक एवं व्यंजक होते हैं तथा इन्हीं के अनुरूप तीन प्रकार के अर्थ- वाच्यार्थ, लक्ष्यार्थ एवं व्यंग्यार्थ होते हैं। शब्द और अर्थ के अनुरूप ही शब्द की तीन शक्तियाँ- अभिधा, लक्षणा एवं व्यंजना होती हैं।

शब्द अर्थ शक्ति
वाचक/अभिधेय वाच्यार्थ/अभिधेयार्थ/मुख्यार्थ अभिधा
लक्षक/लाक्षणिक लक्ष्यार्थ लक्षणा
व्यंजक व्यंग्यार्थ/व्यंजनार्थ व्यंजना

वाच्यार्थ कथित होता है, लक्ष्यार्थ लक्षित होता है और व्यंग्यार्थ व्यंजित, ध्वनित, सूचित या प्रतीत होता है। शब्द में अर्थ तीन प्रकार से आता है। अर्थ के जो तीन स्त्रोत हैं उन्हीं के आधार पर शब्द की शक्तियों का नामकरण किया जाता है।

शब्द शक्ति के प्रकार
प्रक्रिया या पद्धति के आधार पर शब्द-शक्ति तीन प्रकार के होते हैं-

(1) अभिधा (Literal Sense Of a Word)
(2) लक्षणा (Figurative Sense Of a Word)
(3) व्यंजना (Suggestive Sense Of a Word)

अभिधा से मुख्यार्थ का बोध होता है, लक्षणा से मुख्यार्थ से संबद्ध लक्ष्यार्थ का, लेकिन व्यंजना से न मुख्यार्थ का बोध होता है न लक्ष्यार्थ का, बल्कि इन दोनों से भित्र अर्थ व्यंग्यार्थ का बोध होता है।

(1) अभिधा (Literal Sense Of a Word)- जिस शक्ति के माध्यम से शब्द का साक्षात् संकेतित (पहला/मुख्य/प्रसिद्ध/प्रचलित/पूर्वविदित) अर्थ बोध हो, उसे 'अभिधा' कहते हैं।

जैसे- 'बैल खड़ा है।'- इस वाक्य को सुनते ही बैल नामक एक विशेष प्रकार के जीव को हम समझ लेते हैं, उसे आदमी या किताब नहीं समझते।
यहाँ 'बैल' वाचक शब्द है जिसका मुख्यार्थ विशेष जीव है। परंपरा, कोश, व्याकरण आदि से यह अर्थ पूर्वविदित (पहले से मालूम) है। यानी शब्द और उसके अर्थ के बीच किसी प्रकार की बाधा नहीं है।

(अभिधा का अर्थ है 'नाम' ।) दूसरे शब्दों में नामवाची अर्थ को बतलानेवाला शक्ति को अभिधा कहते हैं। नाम जाति, गुण, द्रव्य या क्रिया का होता है और ये सभी साक्षात् संकेतित होते हैं। अभिधा को 'शब्द की प्रथमा शक्ति' भी कहा जाता है।)

उदाहरण- निराला की 'वह तोड़ती पत्थर' कविता के आरंभ की ये पंक्तियाँ अभिधा के प्रयोग का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं-

''वह तोड़ती पत्थर।
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर।''

इन पंक्तियों में कवि, शब्दों से सीधे-सीधे जो अर्थ प्रकट करता है, वही अर्थ कविता का है- कवि ने पत्थर तोड़ती हुई स्त्री को इलाहाबाद के पथ पर देखा।

इस शब्द-शक्ति के द्वारा तीन प्रकार के शब्दों का बोध होता है- रूढ़ शब्द (जैसे-कृष्ण), यौगिक शब्द
(जैसे- पाठशाला) एवं योगरूढ़ शब्द (जैसे- जलज) ।

अभिधा का महत्त्व : अलंकारशास्त्रियों के अनुसार काव्य में अभिधा शब्द-शक्ति का विशेष महत्त्व नहीं है। लेकिन अभिधा एकदम से महत्त्वहीन नहीं है। हिन्दी के रीतिकालीन आचार्य देव का मानना है : ''अभिधा उत्तम काव्य है, मध्य लक्षणालीन/अधम व्यंजना रस विरस, उलटी कहत नवीन।''
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का मत है : ''वास्तव में व्यंग्यार्थ या लक्ष्यार्थ के कारण चमत्कार आता है; परन्तु वह चमत्कार होता है वाच्यार्थ में ही। अतः इस वाच्यार्थ को देने वाली अभिधा शक्ति का अपना महत्त्व है।'' आचार्य शुक्ल अन्यत्र लिखते हैं : ''जब कविता में कल्पना और सौंदर्यवाद का अतिशय जोर हो जाता तब जीवन की वास्तविकता पर बल देने के लिए काव्य में भी अभिधा शक्ति का महत्त्व बढ़ जाता है।''

अभिधा के प्रकार

'अभिधा' शक्ति द्वारा तीन प्रकार के शब्दों का अर्थ-बोध हैं-

(1) रूढ़ शब्द- ये शब्द जातिवाचक होते हैं, जैसे- घोड़ा, मनुष्य आदि;
(2) यौगिक शब्द- इन शब्दों का अर्थ बोध अवयवों (प्रकृति और प्रत्ययों) की शक्ति के द्वारा होता हैं, जैसे-दिवाकर, सुधांशु आदि।
(3) योगरूढ़ शब्द- इनका अर्थ-बोध समुदाय और अवयवों की शक्ति से होता हैं; ये शब्द यौगिक होते हुए भी रूढ़ होते हैं।
जैसे- जलज, वारिज आदि। इनका यौगिक अर्थ जल में उत्पत्र वस्तु हैं पर योगरूढ़ अर्थ केवल 'कमल' हैं।

 
(2) लक्षणा (Figurative Sense Of a Word)- अभिधा के असमर्थ हो जाने पर जिस शक्ति के माध्यम से शब्द का अर्थ बोध हो, उसे 'लक्षणा' कहते हैं।

लक्षणा की शर्ते : लक्षणा के लिए तीन शर्ते है-

(i) मुख्यार्थ में बाधा- इसमें मुख्य अर्थ या अभिधेय अर्थ लागू नहीं होता है वह बाधित (असंगत) हो जाता है।

(ii) मुख्यार्थ एवं लक्ष्यार्थ में संबंध- जब मुख्य अर्थ बाधित हो जाता है, पर यह दूसरा अर्थ अनिवार्य रूप से मुख्य अर्थ से संबंधित होता है।

(iii) रूढ़ि या प्रयोजन- मुख्य अर्थ को छोड़कर उसके दूसरे अर्थ को अपनाने के पीछे या तो कोई रूढ़ि होती है या कोई प्रयोजन।

रूढ़ि कहते हैं प्रयोग-प्रवाह, प्रसिद्ध को। अर्थात वैसा बोलने का चलन है, तरीका है। किसी बात को कहने की जो प्रथा हो जाती है, वह 'रूढ़ि' कहलाती है।
जैसे- ''मुझे देखते ही वह नौ दो ग्यारह हो गया।''- इस वाक्य में 'नौ दो ग्यारह होना' (मुहावरा) का अर्थ है- 'भाग जाना।' इसके बदले में यदि कोई कहे कि 'मुझे देखते ही वह दस बीस चालीस हो गया।' या 'मुझे देखते ही वह ग्यारह दो नौ हो गया।' तो इसका कोई अर्थ नहीं होगा क्योंकि ऐसी कोई रूढ़ि नहीं है। यानी भागने की रूढ़ि अर्थात प्रसिद्ध नौ दो ग्यारह में ही है।

प्रयोजन कहते है अभिप्राय या मतलब को। अर्थात हमारे मन में कोई ऐसा अभिप्राय है जो प्रयुक्त शब्द से व्यक्त नहीं हो रहा है तब उसके लिए दूसरा शब्द प्रयोग कर अपना अभिप्राय प्रकट करते हैं। जैसे हम किसी को अतिशय मूर्ख कहना चाहते हैं तो ''तुम मूर्ख हो।'' कह देने से मूर्खता की अतिशयता प्रकट नहीं होती, लेकिन यदि हम कहे कि ''तुम बैल हो।'' तो इसका अर्थ है कि तुम अतिशय मूर्ख (बुद्धिमान) हो। यहाँ 'बैल' शब्द का प्रयोग मूर्खता की अतिशयता बताने के प्रयोजन से किया गया है।

लक्षणा की शास्त्रीय परिभाषा : मुख्यार्थ के बाधित होने पर जिस शक्ति के द्वारा मुख्यार्थ से संबंधित अन्य अर्थ रूढ़ि या प्रयोजन के कारण लिया जाए, वह 'लक्षणा' है।

उदाहरण-
(i) सभी मुहावरे व लोकोक्तियाँ- सभी मुहावरों एवं लोकोक्तियों में लक्षणा शब्द-शक्ति के सहारे अर्थ ग्रहण किया जाता है। जैसे- ''उसके लिए चुल्लू भर पानी में डूब मरने की बात है।''- इस वाक्य में 'चुल्लू भर पानी में डूब मरना (मुहावरा)' से हमें शब्दों का मुख्यार्थ अभीष्ट नहीं है। हम इनसे दूसरा अर्थ लेते हैं कि 'बड़ी लज्जा की बात है।' इसी तरह 'राम चरण की जगह उसके भतीजे पिण्टू के घर के मालिक होने पर उसके पड़ोसी ने कहा- हंसा थे सो उड़ गये, कागा भये दीवान।'- इस वाक्य में 'हंसा थे सो उड़ गये, कागा भये दीवान (लोकोक्ति) से हम शब्दों का मुख्यार्थ नहीं लेते, बल्कि हम इनसे दूसरा अर्थ लेते हैं कि उक्त घर में 'सज्जन/योग्य/गुणवान व्यक्ति के स्थान पर दुर्जन/अयोग्य/गुणहीन व्यक्ति का आधिपत्य हो गया है।'

(ii) एक पद्यबद्ध उदाहरण- निराला की 'वह तोड़ती पत्थर' कविता की अंतिम पंक्ति-
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खा रोई नहीं।

दृष्टि मार नहीं खाती, प्राणी मार खाता है, दृष्टि नहीं रोती प्राणी रोता है। इसलिए दृष्टि 'जो मार खा रोई नहीं'- इस कथन में अभिधेय अर्थ या मुख्य अर्थ लागू नहीं होता, बाधित हो जाता है। तब हम उससे संबंधित अन्य अर्थ दूसरा अर्थ लेते हैं- कवि उस स्त्री की बात कह रहा है जो जीवन संघर्ष में बार-बार मार खाकर या आघात झेलकर रोई नहीं।

(iii) एक और पद्यबद्ध उदाहरण- दिनकर की काव्य-कृति 'रेणुका' से-
विद्युत की इस चकाचौंध में,
देख, दीप की लौ रोती है,
अरी, ह्रदय को थाम,
महल के लिए झोपड़ी बलि होती है।

इस पद्य का मुख्यार्थ स्पष्ट है कि विद्युत की इस चकाचौंध में दीप की लौ रोती है। अरी ! हृदय को थाम ले, यहाँ महल के लिए झोपड़ी बलि होती है। किन्तु इसका लक्ष्यार्थ यह है कि महलों में रहनेवाले लोगों को जो वैभव प्राप्त है वह वस्तुतः झोंपड़ी में रहनेवाले मजदूरों के श्रम का ही परिणाम है। इस पद्य में 'महल' का अर्थ महल के निवासी अर्थात 'धनी' और 'झोपड़ी' का अर्थ झोंपड़ी के निवासी अर्थात 'निर्धन' अर्थ भी लक्षणा शब्द-शक्ति से गृहीत होते हैं। इसी प्रकार इस पद्य में प्रयुक्त 'विद्युत की चकाचौंध' का 'वैभव' अर्थ और 'दीपक की लौ का रोना' का 'श्रमिक जीवन' अर्थ भी लक्षणा शब्द-शक्ति द्वारा ज्ञात होते हैं।

लक्षणा के भेद
लक्षणा के भेद कारण के आधार पर लक्षणा के दो भेद हैं-
(1) रूढ़ा लक्षणा
(2) प्रयोजनवती लक्षणा

(1) रूढ़ा लक्षणा- जहाँ रूढ़ि के कारण मुख्यार्थ से भिन्न लक्ष्यार्थ का बोध हो, वहाँ 'रूढ़ा लक्षणा' होती है।

उदाहरण :
(i) गद्यात्मक उदाहरण : ''आप तो एकदम राजा हरिश्चन्द्र है'' का लक्ष्यार्थ है आप हरिश्चन्द्र के समान सत्यवादी हैं। सत्यवादी व्यक्ति को राजा हरिश्चन्द्र कहना रूढ़ि है।

(ii) पद्यबद्ध उदाहरण : 'आगि बड़वाग्नि ते बड़ी है आगि पेट की' (तुलसी) का मुख्यार्थ है- बड़वाग्नि यानी समुद्र में लगने वाली आग से बड़ी पेट की आग होती है। पेट में आग नहीं, भूख लगती है इसलिए मुख्यार्थ की बाधा है। लक्ष्यार्थ है तीव्र और कठिन भूख को व्यक्त करना जो पेट की आग के जरिये किया गया है। तीव्र और कठिन भूख के लिए 'पेट में आग लगना' कहना रूढ़ि है।

(2) प्रयोजनवती लक्षणा- जहाँ प्रयोजन के कारण मुख्यार्थ से भिन्न लक्ष्यार्थ का बोध हो, वहाँ 'प्रयोजनवती लक्षणा' होती है।

उदाहरण :
(i) ''शिवाजी सिंह है''- यदि हम कहें कि शिवाजी सिंह हैं। तो सिंह शब्द के मुख्यार्थ (विशेष जीव) में बाधा पड़ जाती है। हम सब जानते है कि शिवाजी आदमी थे, सिंह नहीं लेकिन यहाँ शिवाजी के लिए सिंह शब्द का प्रयोग विशेष प्रयोजन के लिए किया गया है। शिवाजी को वीर या साहसी बताने के लिए सिंह शब्द का प्रयोग हुआ है। इस प्रकार 'सिंह' शब्द का 'वीर' या 'साहसी' अर्थ लक्ष्यार्थ है।

(ii) ''लड़का शेर है''- यदि हम कहें कि 'लड़का शेर है।' तो इसका लक्ष्यार्थ है 'लड़का निडर है।' यहाँ पर शेर का सामान्य अर्थ अभीष्ट नहीं है। लड़के को निडर बताने के प्रयोजन से उसके लिए शेर शब्द का प्रयोग किया गया है।

(iii) एक पद्यबद्ध उदाहरण :
कौशल्या के वचन सुनि भरत सहित रनिवास।
व्याकुल विलप्त राजगृह मनहुँ शोक निवास।। -तुलसी

कौशल्या के वचन सुनकर समस्त राजगृह व्याकुल होकर रो रहा है। 'राजगृह' अर्थात राजभवन नहीं रो सकता। 'राजगृह' का लक्ष्यार्थ है 'राजगृह में रहनेवाले लोग' । समस्त राजगृह के रोने से अत्यधिक दुःख को व्यक्त करने का विशेष प्रयोजन है।
प्रयोजनवती लक्षणा के भेद

भेद लक्षण/पहचान-चिह्न परिभाषा एवं उदाहरण
(1) गौणी लक्षणा सादृश्य संबंध जहाँ सादृश्य संबंध अर्थात समान गुण या धर्म के कारण लक्ष्यार्थ की प्रतीति हो।
उदाहरण : 'मुख कमल'। सादृश्य संबंध के द्वारा लक्ष्यार्थ का बोध हो रहा है कि मुख कमल के समान कोमल है।
(i) सारोपा
(स +_आरोपा) विषय/उपमेय/आरोप का विषय + विषयी/उपमान/आरोप्यमाण (दोनों) जहाँ विषय और विषयी दोनों का शब्द निर्देश करते हुए अभेद बताया जाए।
उदाहरण : 'सीता गाय है।' का लक्ष्यार्थ है- सीता सीधी-सादी है। यहाँ गाय (विषयी) का सीधापन-सादापन सीता (विषय) पर आरोपित है।
(ii) साध्यावसाना (स + अध्यवसाना) अध्यवसान =आत्मसात, निगरण विषयी (केवल) जहाँ केवल विषयी का कथन कर अभेद बताया जाए।
उदाहरण : यदि कोई मालिक खीझ कर नौकर को कहे कि 'बैल कहीं का।' तो इस वाक्य में विषय (नौकर) का निर्देश नहीं है, केवल विषयी (बैल) का कथन है।
(2) शुद्धा लक्षणा सादृश्येतर संबंध सादृश्येतर
= सादृश्य + इतर जहाँ सादृश्येतर संबंध (सादृश्य संबंध के अतिरिक्त किसी अन्य संबंध) से लक्ष्यार्थ की प्रतीति हो।
सादृश्येतर संबंध हैं- आधार-आधेय भाव, सामीप्य, वैपरीत्य, कार्य-कारण, तात्कर्म्य आदि।
उदाहरण :
(i) आधार-आधेय संबंध का उदाहरण : 'महात्मा गाँधी को देखने के लिए सारा शहर उमड़ पड़ा।' यहाँ 'शहर' का मुख्यार्थ (नगर) बाधित है, 'शहर' का लक्ष्यार्थ है- 'शहर के निवासी' । शहर है- आधार और शहर का निवासी है- आधेय।
(ii) सामीप्य संबंध का उदाहरण : आँचल में है दूध और आँखों में पानी। (यशोधरा) यहाँ आँचल का मुख्यार्थ (साड़ी का छोर) बाधित है, आँचल मैथलीशरण गुप्त का लक्ष्यार्थ है- स्तन। चूँकि आँचल सदा स्तन के समीप रहता है, इसलिए आँचल और स्तन में सामीप्य संबंध है।
(iii) वैपरीत्य संबंध का उदाहरण : 'तुम सूख-सूख कर हाथी हुए जा रहे हो।' कोई व्यक्ति सूख-सूखकर हाथी नहीं हो सकता है, लक्ष्यार्थ है- तुम बहुत दुर्बल हो गये हो।
(iv) वैपरीत्य संबंध का एक और उदाहरण : 'उधो तुम अति चतुर सुजान' यहाँ जब गोपियाँ उद्धव को चतुर और सुजान बता रही है तो सूरदास वे वस्तुतः उद्धव को सीधा और अजान कह रही है। यहाँ चतुर और सुजान के मुख्यार्थ बाधित है और उनमें चतुरता का अभाव और अज्ञता का बोध कराना लक्ष्यार्थ है।
(i) उपादान लक्षणा (उपादान = ग्रहण करना) मुख्यार्थ + लक्ष्यार्थ (दोनों) जहाँ मुख्यार्थ के साथ लक्ष्यार्थ का भी ग्रहण हो।
उदाहरण : 'पगड़ी की लाज रखिए।' यहाँ 'पगड़ी' का मुख्यार्थ है- पगड़ी, पाग और लक्ष्यार्थ है- 'पगड़ी वाला' । यहाँ लक्ष्यार्थ के साथ-साथ मुख्यार्थ का भी ग्रहण किया गया है।
(ii) लक्षण-लक्षणा लक्ष्यार्थ (केवल) जहाँ मुख्यार्थ को छोड़कर (त्याग कर) केवल लक्ष्यार्थ का ग्रहण हो।
उदाहरण :
(i) 'वह पढ़ाने में बहुत कुशल है।'- इस वाक्य में 'कुशल' का मुख्यार्थ (कुशलाने वाला) बाधित है और केवल लक्ष्यार्थ (दक्ष) का ग्रहण किया गया है।
(ii) 'माधुरी नृत्य में प्रवीण है।'- इस वाक्य में 'प्रवीण' का मुख्यार्थ (वीणा बजाने में निपुण) बाधित है और केवल लक्ष्यार्थ (कुशल) को ग्रहीत किया गया है।
(iii) 'देवदत्त चौकन्ना हो गया।'- इस वाक्य में 'चौकन्ना' का मुख्यार्थ (चार कानों वाला) बाधित है और केवल लक्ष्यार्थ (सावधान) का ग्रहण किया गया है।
लक्षणा का महत्त्व : काव्य में लक्षणा के प्रयोग से जीवन के अनुभव को समृद्ध किया जाता है। कल्पना के सहारे सादृश्य और साधर्म्य के अनेकानेक विधानों द्वारा अनुभवों की सूक्ष्मता और विस्तार को प्रकट किया जाता है। इसलिए काव्य में लक्षणा शब्द-शक्ति की प्रबलता है।

(3) व्यंजना (Suggestive Sense Of a Word)- अभिधा व लक्षणा के असमर्थ हो जाने पर जिस शक्ति के माध्यम से शब्द का अर्थ बोध हो, उसे 'व्यंजना' कहते हैं।
दूसरे शब्दों में-शब्द के जिस व्यापार से मुख्य और लक्ष्य अर्थ से भिन्न अर्थ की प्रतीति हो उसे 'व्यंजना' कहते हैं।

'अंजन' शब्द में 'वि' उपसर्ग लगाने से 'व्यंजन' शब्द बना हैं; अतः व्यंजन का अर्थ हुआ 'विशेष प्रकार का व्यंजन'। आँख में लगा हुआ अंजन जिसप्रकार दृष्टि-दोष दूर कर उसे निर्मल बनाता हैं, उसी प्रकार व्यंजना-शक्ति शब्द के मुख्यार्थ और लक्ष्यार्थ को पीछे छोड़ती हुई उसके मूल में छिपे हुए अकथित अर्थ को प्रकाशित करती हैं।

अभिधा और लक्षणा अपने अर्थ का बोध करा कर जब अलग हो जाती हैं तब जिस शब्द-शक्ति द्वारा व्यंग्यार्थ का बोध होता हैं उसे व्यंजना-शक्ति कहते हैं। व्यंग्यार्थ के लिए 'ध्वन्यार्थ', 'सूच्यार्थ', 'आक्षेपार्थ', 'प्रतीयमानार्थ' जैसे शब्दों का प्रयोग होता हैं।

उदाहरण :

(i) प्रसिद्ध उदाहरण : 'सूर्य अस्त हो गया।' इस वाक्य के सुनने के उपरांत प्रत्येक व्यक्ति इससे भिन्न-भिन्न अर्थ ग्रहण करता है। प्रसंग विशेष के अनुसार इस वाक्य के अनंत व्यंजनार्थ हो सकते हैं।

वाक्य प्रसंग विशेष (वक्ता-श्रोता) अर्थ
सूर्य अस्त हो गया पिता के पुत्र से कहने पर पढ़ाई-लिखाई शुरू करो।
सास के बहू से कहने पर चूल्हा-चौका आरंभ करो।
किसान के हलवाहे से कहने पर हल चलाना बंद करो
पशुपालक के चरवाहे से कहने पर पशुओं को घर ले चलो।
पुजारी के चेले से कहने पर संध्या-पूजन का प्रबंध करो।
राहगीर के अपने साथी से कहने पर ठहरने का इंतजाम करो।
कारवाँ-प्रमुख के उपप्रमुख से कहने पर पड़ाव की व्यवस्था करो।
इस तरह इस एक वाक्य से वक्ता-श्रोता के अनुसार न जाने कितने अर्थ निकल सकते हैं। यहाँ जिसने भी अर्थ दिये गये है वे साक्षात् संकेतित नहीं है, इसलिए इनमें अभिधा शक्ति नहीं है। इनमें लक्षणा शक्ति भी नहीं है, कारण है कि उक्त वाक्य लक्षणा की शर्त मुख्यार्थ में बाधा को पूरा नहीं करता क्योंकि यहाँ सूर्य का जो मुख्यार्थ है वह मौजूद है। साफ है कि इनमें पायी जानेवाली शब्द-शक्ति व्यंजना है।

(ii) एक पद्यबद्ध उदाहरण :
प्रभुहिं चितइ पुनि चितइ महि राजत लोचन लोल।
खेलत मनसिजु-मीन-जुग, जनु विधुमंडल डोल।। - तुलसी

यहाँ धनुष-यज्ञ के प्रसंग में सीता की मनोदशा का चित्रण किया गया है। इस पद्य की पहली पंक्ति का वाच्यार्थ/अभिधेयार्थ यह है कि सीता पहले राम की ओर देखती है और फिर धरती की ओर। इससे उनके चपल नेत्र शोभित हो रहे हैं। किन्तु व्यंजनार्थ यह है कि सीता के मन में इस समय उत्सुकता, हर्ष, लज्जा आदि के भाव क्षण-क्षण में प्रकट हो रहे हैं। राम को देखकर उत्सुकता और हर्ष का भाव उत्पन्न होता है, साथ ही दूसरों की उपस्थिति का ध्यान कर उनके मन में तुरंत लज्जा भी आ जाती है, और वे धरती की ओर देखने लगती है। पर हर्ष और उत्सुकता के वशीभूत होने से वे अपने को रोक नहीं पाती और फिर राम की और देखती है, किन्तु लज्जावश फिर धरती की ओर देखने लगती है। इस प्रकार यह चक्र कुछ समय तक चलता रहता है।
स्पष्ट है कि उक्त पद्य की पहली पंक्ति से हमें हर्ष, उत्सुकता, लज्जा आदि भावों की जो प्रतीति होती है वह न तो अभिधा शक्ति से होती है और न लक्षणा शक्ति से, बल्कि होती है व्यंजना शक्ति से।

(iii) एक और पद्यबद्ध उदाहरण :
चलती चाकी देख के दिया कबीरा रोय।
दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय।। -कबीर

यहाँ चलती चक्की को देखकर कबीरदास के दुःखी होने की बात कही गई है। उसके द्वारा यह अर्थ व्यंजित होता है कि संसार चक्की के समान है जिसके जन्म और मृत्यु रूपी दो पार्टों के बीच आदमी पिसता रहता है।
व्यंजना के भेद
व्यंजना के दो भेद है-
(1) शाब्दी व्यंजना
(2) आर्थी व्यंजना।

(1) शाब्दी व्यंजना- शब्द पर आधारित व्यंजना को 'शाब्दी व्यंजना' कहते है।

(2)आर्थी व्यंजना- अर्थ पर आधारित व्यंजना को 'आर्थी व्यंजना' कहते हैं।

शब्द दो प्रकार के होते है- एकार्थक एवं अनेकार्थक। जिन शब्दों का केवल एक ही अर्थ होता है, उन्हें 'एकार्थक शब्द' कहते हैं। जैसे- पुस्तक, दवा इत्यादि।
जिन शब्दों के एक से अधिक अर्थ होते हैं, उन्हें 'अनेकार्थक शब्द' कहते है।
जैसे- कलम [अर्थ- (1) लेखनी (2) पेड़-पौधे की टहनी (3) कलमकार की कूची (4) चित्र-शैली (जैसे- पटना कलम) आदि], पानी (अर्थ- (1) जल (2) चमक (3) प्रतिष्ठा आदि) इत्यादि।
अनेकार्थक शब्दों पर टिकी व्यंजना को 'शाब्दी व्यंजना' तथा एकार्थक शब्दों पर टिकी व्यंजना को 'आर्थी व्यंजना' कहते हैं।

व्यंजना के भेद

भेद लक्षण/पहचान-चिह्न परिभाषा एवं उदाहरण
(1) शाब्दी व्यंजना अनेकार्थक शब्दों का प्रयोग जहाँ अनेकार्थक शब्दों का प्रयोग हो, वहाँ 'शाब्दी व्यंजना' होती है। अनेकार्थक शब्द के अर्थ का निश्चय 14 आधारों में से किसी एक या अधिक आधार पर किया जाता है- संयोग, असंयोग, साहचर्य, विरोध, अर्थ, प्रकरण, लिंग, अन्य-सन्निधि (वक्ता व श्रोता के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति की उपस्थिति), सामर्थ्य, औचित्य, देश, काल, व्यक्ति और काकु (स्वर विकार) ।
शाब्दी व्यंजना के दो भेद हैं-
अभिधामूला एवं लक्षणामूला।
(i) अभिधामूला शाब्दी व्यंजना अभिधात्मक शब्द पर आश्रित (निर्भर) अभिधात्मक शब्द पर आश्रित (निर्भर) शाब्दी व्यंजना 'अभिधामूला शाब्दी व्यंजना' कहलाती है।
उदाहरण : चिर जीवो जोरी जुरै, क्यों न सनेह गँभीर।
को घटि ये वृषभानुजा, वे हलधर के वीर।। -बिहारी
बिहारी के इस दोहे का अभिधेयार्थ है- राधा कृष्ण की यह जोड़ी चिरजीवी हो। इनका गहरा प्रेम क्यों न जुड़े ? दोनों में कौन किससे घटकर है ? ये वृषभानुजा (वृषभानु + जा = वृषभानु की जाया/बेटी = राधा) है और वे हलधर (बलराम) के वीर भाई यानी कृष्ण।
किन्तु 'वृषभानुजा' एवं 'हलधर के वीर' शब्द अनेकार्थक है, अतः उनसे दूसरा और तीसरा अर्थ भी ध्वनित होता है। दूसरे अर्थ में ये वृषभ + अनुजा =बैल की बहन यानी 'गाय' है और वे हलधर = बैल के वीर =भाई यानी 'साँड़' है। तीसरे अर्थ में ये 'वृष राशि में उत्पन्न' है और वे 'शेषनाग के अवतार' ।
इस दोहे में 'वृषभानुजा' के स्थान पर 'राधा' एवं 'हलधर' के स्थान पर 'बलराम' शब्द का प्रयोग कर दिया जाये तो यह व्यंग्यार्थ नष्ट हो जायेगा।

(ii) लक्षणामूला शाब्दी व्यंजना लाक्षणिक शब्द पर आश्रित (निर्भर) लाक्षणिक शब्द पर आश्रित व्यंजना 'लक्षणामूला शाब्दी व्यंजना' कहलाती है।
उदाहरण : फली सकल मनकामना, लूट्यौ अगणित चैन।
आजु अँचे हरि रूप सखि, भये प्रफुल्लित नैन।।
इस उदाहरण में लक्षणा के 'फली' का अर्थ है- पूर्ण हुई, 'लूटयौ' का अर्थ है- प्राप्त किया और 'अँचै' का अर्थ है- देखा। किन्तु व्यंजना से संपूर्ण पद का व्यंग्यार्थ है- प्रियतम के दर्शन से अत्यधिक आनंद प्राप्त किया।
(2) आर्थी व्यंजना एकार्थक शब्दों का प्रयोग जहाँ एकार्थक शब्दों का प्रयोग हो, वहाँ 'आर्थी व्यंजना' होती है।
एकार्थक शब्दों के अर्थ का निश्चय 10 आधारों में से किसी एक या अधिक आधार पर किया जाता है- वक्ता (कहनेवाला), बोधव्य (सुननेवाला), काकु (स्वर विकार), वाक्य, वाच्य, अन्य-सन्निधि (कहनेवाले) और सुननेवाले के अलावा किसी तीसरे शख्स की मौजूदगी), प्रकरण (प्रसंग), देश, काल एवं चेष्टा।
उदाहरण : (i) काकु का उदाहरण-
मैं सुकुमारि, नाथ वन जोगू।
तुमहिं उचित तप, मो कहँ भोगू।। -तुलसी

सीता, राम से कहती है कि मैं सुकुमारी हूँ और आप वन जाने के योग्य हैं; आपके लिए तप का रास्ता उचित है और मुझे भोग के रास्ते पर चलने को कह रहे हैं। यहाँ सीता के कहने के विशेष प्रकार यानी स्वर विकार (काकु) के कारण यह ध्वनित हो रहा है कि मैं ही सुकुमारी नहीं हूँ, आप भी सुकुमार हैं। आप वन जाने के योग्य हैं तो मैं भी वन जाने के योग्य हूँ। मैं राजकुमारी हूँ तो आप भी राजकुमार हैं। अतः मेरा भी वन जाना उचित है। चूँकि इसमें प्रयुक्त सभी शब्द एकार्थक हैं इसलिए आर्थी व्यंजना हैं।

(ii) अन्य सन्निधि का उदाहरण : एक लड़की किसी लड़के से प्रेम करती है। उससे मिलने को व्याकुल है, पर उसे कोई खबर भी नहीं भिजवा सकती। अचानक एक दिन वह लड़का दिख गया, पर उस समय लड़की की सखी मौजूद थी। लड़की ने होशियारी के साथ अपनी सखी से कहा- ''क्या बताऊँ सखी, दिन भर काम में जुटी रहती हूँ। सिर्फ शाम को थोड़ी फुरसत मिलती है तब कहीं नदी किनारे पानी लाने जाती हूँ, पर उस समय कोई चिड़िया का पूत भी नहीं होता। क्या करूँ, लाचार हूँ।''
इस साधारण वाक्य का अर्थ उस लड़के के नजदीक रहने (अन्य-सन्निधि) से यह हो जाता है कि तुम शाम को नदी किनारे मिलो।

(iii) चेष्टा का उदाहरण :
कोटि मनोज लजावन हारे।
सुमुखि कहहु को अहहिं तुम्हारे।।
सुनि स्नेहमय मंजुल बानी।
संकुचि सीय मन मँह मुसकानी।। -तुलसी

तुलसी के इस चौपाई का मुख्यार्थ है- वनवास के समय राम, सीता एवं लक्ष्मण के दिव्य रूप को देखकर वन की स्त्रियों में सीता से राम की ओर संकेत कर परिचय पूछा तो उनकी स्निग्ध भोली वाणी सुनकर सीता ने संकोच के साथ मुस्कुरा दिया।
किन्तु इस चौपाई को व्यंग्यार्थ है- सीता ने कुछ बोलकर उनके (वन के स्त्रियों के) प्रश्न का उत्तर नहीं दिया पर उनकी संकोच भरी मुस्कान ने बता दिया कि 'ये मेरे पति हैं।'
चूँकि इस चौपाई में प्रयुक्त सभी शब्द एकार्थक है इसलिए इसमें आर्थी व्यंजना है और आर्थी व्यंजना का आधार आंगिक चेष्टा (संकोच भरी मुस्कान) है।

व्यंजना का महत्त्व : काव्य सौंदर्य के बोध में व्यंजना शब्द शक्ति का विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण स्थान है। व्यंजना शब्द-शक्ति काव्य में अर्थ की गहराई, सघनता और विस्तार लाता है। काव्यशास्त्रियों ने सर्वश्रेष्ठ काव्य की सत्ता वहीं स्वीकार की है जहाँ रस व्यंग्य (व्यंजित) हो। रीतिकालीन कवि और आचार्य प्रतापसाहि के शब्दों में-

व्यंग्य जीव है कवित में शब्द अर्थ गति अंग।
सोई उत्तर काव्य है वरणै व्यंग्य प्रसंग।।

अभिधा और लक्षणा में अंतर

अभिधा और लक्षणा में अंतर इस प्रकार हैं-
(i) अभिधा और लक्षणादोनों शब्द-शक्तियाँ हैं। दोनों से शब्दों के अर्थ का बोध होता है, पर अभिधा से शब्द के मुख्यार्थ का बोध होता है, किन्तु लक्षणा से मुख्यार्थ का बोध नहीं होता, बल्कि मुख्यार्थ से संबंधित अन्य अर्थ (लक्ष्यार्थ) का बोध होता है।

अभिधा का उदाहरण- 'बैल खड़ा है।'- इस वाक्य में बैल शब्द सुनते ही 'पशु विशेष' का चित्र आँखों के सामने आ जाता है। लक्षणा का उदाहरण- 'सुनील बैल है।'- सुनील को बैल कहने में मुख्यार्थ की बाधा है, क्योंकि कोई आदमी बैल नहीं हो सकता। बैल में जड़ता, बुद्धिहीनता आदि धर्म होते हैं। सुनील में भी बुद्धिहीनता है, इसलिए सादृश्य संबंध से बैल का लक्ष्यार्थ किया गया- बुद्धिहीन। बुद्धिहीनता का बोध हुआ लक्षणा के द्वारा। इसलिए इस वाक्य में लक्षणा है।

(ii) अभिधा शब्द-शक्ति तत्काल अपने मुख्यार्थ का बोध करा देती है, पर लक्षणा शब्द-शक्ति अपने लक्ष्यार्थ का बोध तत्काल नहीं करा पाती है। लक्षणा के लिए तीन बातों का होना नितांत आवश्यक है- मुख्यार्थ में बाधा, मुख्यार्थ और लक्ष्यार्थ में संबंध तथा रूढ़ि या प्रयोजन। इस त्रयी के अभाव में लक्षणा की कल्पना नहीं की जा सकती, लेकिन अभिधा की जा सकती है।

(iii) अभिधा शब्द-शक्ति शब्द की सबसे साधारण शक्ति है। इस शब्द-शक्ति का काव्य में कोई विशेष स्थान नहीं है, क्योंकि वाच्य (अभिधेय) शब्द में कोई चमत्कार नहीं रहता।
लक्षक (लाक्षणिक) शब्द में चमत्कार रहता है, इसलिए इसकी काव्य में अधिक उपयोगिता है।

अभिधा, लक्षणा एवं व्यंजना में अंतर

अभिधा, लक्षणा एवं व्यंजना के बीच अंतर इस प्रकार हैं-
(i) अभिधा किसी शब्द के केवल उसी अर्थ को बतलाती है जो पहले से निश्चित और व्यवहार में प्रसिद्ध हो। यह अर्थ भाषा सीखते समय हमें बताया जाता है। शब्दकोश या व्याकरण से हम इस अर्थ को जानते हैं। किन्तु लक्षणा और व्यंजना से हम शब्दों के जो अर्थ निकालते हैं वे पहले से जाने हुए नहीं होते।

लक्षणा से हम शब्दों से ऐसा अर्थ निकालते हैं, जो शब्दों से सामान्यतः नहीं लिया जाता। पर यह अर्थ सदैव मुख्यार्थ से संबंधित ही होगा।

व्यंजना के द्वारा हम शब्दों से ऐसा अर्थ भी निकालते हैं जो उनके मुख्यार्थ से संबंधित न हों।
दूसरे शब्दों में एक बात के भीतर जो दूसरी बात छिपी रहती है उसे व्यंजना शक्ति के द्वारा निकालते हैं।

(ii) अभिधा शक्ति शब्द की सबसे सामान्य शक्ति है। इसके द्वारा व्यक्त अर्थ में चमत्कार नहीं रहता है। दूसरी ओर लक्षणा और व्यंजना के अर्थ में विलक्षणता रहती है, इसलिए काव्य में जितना महत्त्व लक्षणा और व्यंजना का है, उतना अभिधा का नहीं।

व्यंजना का काव्यशास्त्र (साहित्यशास्त्र) में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। भले ही वैयाकरण, नैयायिक, मीमांसक, वेदांती आदि अभिधा के महत्त्व से संतुष्ट हो जाये, पर काव्यशास्त्र तो रसप्रधान है, रसास्वादन के बिना, सहृदय की तृप्ति नहीं होती और उस रसाभिव्यक्ति के लिए व्यंजना शक्ति की सत्ता नितांत आवश्यक है।

(iii) अभिधा और लक्षणा का व्यापार केवल शब्दों में होता है, किन्तु व्यंजना का व्यापार शब्द और अर्थ दोनों में।

(iv) वाचक और लक्षक तो केवल शब्द होते हैं, किन्तु व्यंजक केवल शब्द ही नहीं अपितु वक्ता, श्रोता, देश, काल, चेष्टा प्रकरण आदि भी व्यंजक होते हैं।