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06 अप्रैल 2024

सन्धि की सबसे आसान ट्रिक्स

संधि को पहचानने की सबसे आसान ट्रिक

 

   1-

  अ

   2-

   इ,

   3-

   एऐ ,

गुण सन्धि   
→→    1+2      (नरेन्द्र= नर+इन्द्र , दिनेश, महोत्सव = महा+उत्सव )       
 यण सन्धि   
→→   2+ भिन्न स्वर    (पर्यावरण = परि+आवरण स्वागत=सु+आगत,

 अयादि      

→→   3+ भिन्न स्वर    ( नयन= ने+अन , पावन=पौ+अन, नायक )

 वृद्धि सन्धि

→→     1+3              (एकैक= एक+एक , वनौषधि=वन+औषधि,  

 दीर्घ सन्धि 

→→     दो समान वर्ण मिलते हैं तो दीर्घ स्वर बन जाते हैं ।

              अ+अ =         क्रमानुसार, विद्यालय

              इ+इ  =          नारीश्वर

              उ+उ  =          लघूत्तर

03 अप्रैल 2024

 हिन्दी भाषा की प्रमुख बोलियों का क्षेत्र

 

बोली 

बोली का क्षेत्र व जिला 

ब्रज भाषा 

मथुरा , आगरा, भरतपुर, करौली, अलीगढ, बरेली, बदायूं, एटा, गुड़गावं ,

अवधी भाषा 

अयोध्या, लखनऊ, प्रयागराज,जौनपुर , मिर्जापुर, सीतापुर, रायबरेली, लखीमपुर खीरी, बहराइच, गोंडा, प्रतापगढ़, उन्नाव, सुल्तानपुर, बारांबाकी। 

खड़ीबोली 

रामपुर मुरादाबाद, मेरठ, मुजफ्फरनगर, दिल्ली, सहारनपुर , गाजियाबाद, बिजनौर।

भोजपुरी भाषा 

भोजपुर बनारस, बलिया, गाजीपुर, देवरिया, शाहाबाद, छपरा, चम्पारण, गोरखपुर।  

मालवी भाषा 

इंदौर, उज्जैन, देवास, रतलाम, प्रतापगढ़, राजगढ़। 

मारवाड़ी भाषा 

जोधपुर, पाली, नागौर, जैसलमेर ,

बुंदेली भाषा 

झाँसी , उरई, जालौन, हमीरपुर,सागर, दतिया, होशंगाबाद ओरछा।

29 मार्च 2024

हिंदी साहित्येतिहास लेखन की परंपरा

हिंदी साहित्येतिहास की परम्परा में इतिहास  लिखने का पहला पहला प्रयास एक फ़्रांसिसी विद्वान गार्सा द तासी द्वारा किया गया था।
  • फ़्रांसिसी विद्वान गार्सा द तासी ने अपने इस हिंदी साहित्येतिहास के ग्रन्थ का नाम  इस्तवार द लितरेत्युर ऐन्दुई ऐन्दुस्तानी  रखा था।  
  • यह हिंदी सहित्येतिहास की परम्परा का पहला इतिहास अवश्य था किन्तु मूलतः फ़्रांसिसी भाषा में लिखा गया था, ना की हिंदी भाषा में।  
  • यह ग्रन्थ वर्ष 1839  और  1847  में प्रकाशित हुआ था, इस प्रकार ये ग्रन्थ दो भागों में मिलता है.. 
  • फ़्रांसिसी विद्वान गार्सा द तासी के इस ग्रन्थ में हिंदी के साथ साथ उर्दू के कवियों का भी उल्लेख है।  
  • 1847 में प्रकाशित दूसरे भाग को फिर तीन भागों में बाँट दिया गया जो आगे चलकर 1871 में प्रकाशित हुए।
  • इसमें कवियों का विवरण अंग्रेजी वर्ण के क्रमानुसार दिया गया है।  
  • तासी के इस ग्रन्थ में कुल 738 कवियों का विवरण है किन्तु इनमें से हिंदी के केवल 72 कवि ही शामिल हैं , शेष उर्दू के कवि हैं. 
  •       "हिन्दुई साहित्य का इतिहास ". :
  •                     ↳  यह फ़्रांसिसी विद्वान गार्सा द तासी  द्वारा लिखित इतिहास का हिंदी अनुवाद ग्रन्थ है।  
  •                     ↳  इस हिंदी अनुवाद के लेखक लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय हैं।  
  •                     ↳  यह हिंदी अनुवाद वर्ष  1952  में प्रकाशित हुआ था. 
  •  फ़्रांसिसी विद्वान गार्सा द तासी के बाद हिंदी साहित्य इतिहास लेखन की परम्परा में जॉर्ज ग्रियर्सन का नाम आता है।  
  • जॉर्ज ग्रियर्सन ने द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान  के नाम से हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा ।  
  • इसका प्रकाशन एशियाटिक सोसाईटी ऑफ बंगाल की पत्रिका के विशेषांक के रूप में हुआ था।  
  • इसका प्रकाशन वर्ष 1888  था।  
  • हिंदी के विद्वान इसे सही अर्थों में हिंदी साहित्य का पहला इतिहास बताते हैं,  क्योंकि इसमें पहली बार कवियों और लेखकों का कालक्रमानुसार वर्णन किया गया है और काव्य प्रवृतियों का प्रयोग किया गया है, साथ ही अपने युग की परिस्थितियों का संकेत दिया गया है।  
  • इस ग्रन्थ में ग्रियर्सन ने हिंदी भाषा के अलावा अन्य भाषा के कवियों को शामिल नहीं किया है जैसे तासी  ने किया था. 
  • इसमें लगभग 952 कवियों का जीवन चरित शामिल किया गया है।
  • ग्रियर्सन ने हिंदी साहित्य के इतिहास को स्पष्ट करने के लिए उसे चरण काव्य , धार्मिक काव्य, प्रेमकाव्य , दरबारी काव्य आदि भागों में विभाजित किया है.
  • वो लेखक जॉर्ज ग्रियर्सन ही थे जिन्होंने भक्तिकाल को सम्पूर्ण हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग घोषित किया था.    
  • "हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास "-------
  • यह ग्रन्थ जॉर्ज ग्रियर्सन  के इतिहास का हिंदी अनुवाद है. 
  • इसका हिंदी अनुवाद करने वाले विद्वान का नाम डॉ किशोरी लाल गुप्त है. 
  • यह हिंदी अनुवाद वर्ष 1957  में किया गया था।  
  • इसके बाद शिव सिंह सेंगर ने शिव सिंह सरोज  नाम से हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा.
  • य इतिहास वर्ष 1883  में सामने आया। 
  • इसमें लगभग 838  कवियों के बारे में चर्चा  की गई है।  
  • इसके तत्पश्चात मिश्रबन्धु विनोद नामक इतिहास ग्रन्थ सामने आता है जिसके लेखक मिश्रबन्धु माने जाते है।  
  • मिश्रबन्धुविनोद का प्रकाशन हमें चार भागों में मिलता है।  
  • इन चार भागों में से पहले तीन भाग तो 1913  में ही प्रकाशित हो गए थे किन्तु चौथा भाग 1934  में जाकर प्रकाशित हुआ। 
  • इस इतिहास में लगभग एक हजार कवियों को शामिल  किया गया है. 
  • आचार्य शुक्ल ने इस ग्रन्थ को भी कविवृत संग्रह  की संज्ञा दी है।  
  •  गणेशबिहारी मिश्र  + श्यामबिहारी मिश्र  + शुकदेव बिहारी मिश्र  = मिश्रबन्धु 
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा लिखित " हिंदी सहित्य का इतिहास " पहला व्यवस्थित इतिहास माना  जाता है। यह इतिहास ऐतिहासिक और वैज्ञानिक दृष्टि से लिखा गया पहला इतिहास है और इस इतिहास को लिखने में शुक्लजी ने विधेयवादी पद्धति का प्रयोग किया था। 
  •  
  • यह इतिहास " हिंदी साहित्य का विकास  " के शीर्षक से नागरी प्रचारणी सभा द्वारा वर्ष 1929 में प्रकाशित करवाया गया था.  . 
  • हिंदी के इतिहास का सही कालविभाजन और सही नामकरण शुक्लजी के इतिहास की ही देन  है . 
  • शुक्लजी ने  द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान + शिवसिंह सरोज + मिश्रबन्धु विनोद जैसे आरंभिक इतिहासों को कविवृत संग्रह  कहा है। 
  •  
  • "भाषा काव्य संग्रह  " ---                              
  •                   ↳   यह इतिहास हिंदी भाषा में लिखा पहला इतिहास  ग्रन्थ है।  
  •                   ↳   खक -- महेशदत्त शुक्ल।  
  •                   ↳   प्रकाशन वर्ष ---1873

  • हिंदी के कुछ इतिहास ग्रन्थ अंग्रेजी भाषा में भी  लिखे गए हैं , जैसे - 

  •                    ↳  "ए स्केच ऑफ़ हिंदी लिटरेचर "
  •                    ↳  लेखक --एडविन ग्रीव्ज़ महोदय ,
  •                    ↳  प्रकाशन वर्ष ----1917
  •  
  •                    ↳  " ए हिस्ट्री ऑफ हिंदी लिटरेचर  "
  •                    ↳   लेखक - एफ ई के महोदय 
  •                     ↳  1920 
  •     इसी कड़ी में डॉ बच्चन सिंह का लिखा हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास  का नाम आता है। इन्होंने आदिकाल को आदिकाल न बोलकर अपभ्रंशकाल, जातीय साहित्य का उदय कहकर सम्बोधित किया।  

  •    डॉ रामविलास शर्मा ने मार्क्सवादी - समाजवादी दृष्टि से हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा है।
  •   वर्ष 1848  में मौलवी करीमुद्दीन ने तजकिरा ई शुअराई  हिंदी नामक हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा था। 
  •  
  • आचार्य शुक्ल के बाद का सर्वाधिक चर्चित इतिहास आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का माना  जाता है जिन्होंने 1940  में हिंदी साहित्य की भूमिका, 1952  में हिंदी साहित्य ; उद्भव और विकास तथा हिंदी साहित्य का आदिकाल नाम से इतिहास की रचना की है। 
  •  
  • आचार्य द्विवेदी ने आचार्य शुक्ल की कई मान्यताओं पर असहमति जताते हुए उन पर अपनी दृष्टि से विचार किया है।   आचार्य द्विवेदी ने परम्परा के आधार पर अपनी आलोचना पद्धति स्थापित की है।
  • आचार्य रामकुमार वर्मा ने वर्ष 1938 में हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास नामक इतिहास ग्रंथ लिखा जिसमें लेखक ने भक्तिकाल तक का ही इतिहास लेते हुए 693 ई से 1693 ई तक का ही विश्लेषण किया है और हिंदी साहित्य का आरंभ 693 ई माना है।
  • ये इतिहास ग्रंथ सात प्रकरण में बटा है।
  • स्वयंभू को हिंदी का पहला कवि मानने वाले रामकुमार वर्मा ही हैं
  • हिंदी साहित्य का वृहद इतिहास नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा 16 खंडों/भागों में प्रकाशित करवाया गया। इसी का छठा,  दसवां, पंद्रहवाँ खंड/भाग डॉ नगेन्द्र द्वारा संपादित किया गया।
  • अन्य प्रमुख इतिहास ग्रंथ------

  • हिंदी साहित्य (डॉ धीरेंद्र वर्मा)
  • राजस्थानी भाषा व साहित्य (डॉ मोतीलाल मेनारिया)
  • आधुनिक हिंदी साहित्य (नंददुलारे वाजपेयी)
  • हिंदी साहित्य: बीसवीं शताब्दी (नंददुलारे वाजपेयी)
  • हिंदी साहित्य का अतीत (विश्वनाथ प्रसाद मिश्र)
  • हिंदी काव्यधारा (राहुल सांकृत्यायन)
  • हिंदी साहित्य विमर्श (पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी)
  • कविता कौमुदी (रामनरेश त्रिपाठी)
  • हिंदी कोविद रत्नमाला(श्यामसुंदर दास)
  • हिंदी काव्यशास्त्र का इतिहास(भागीरथ मिश्र)
  • हिंदी साहित्य का इतिहास (डॉ नगेन्द्र)
  • हिंदी साहित्य और संवेदना का इतिहास (डॉ रामस्वरूप चतुर्वेदी)
  • हिंदीसाहित्य का विवेचनात्मक इतिहास( सूर्यकांत शास्त्री)
  • खड़ीबोली हिंदी साहित्य का इतिहास( ब्रजरत्न दास)
  • ब्रज माधुरी सार (वियोगी हरि)
  • हिंदीसाहित्य का दूसरा इतिहास ( डॉ बच्चन सिंह)
  • हिंदी साहित्य का आधा इतिहास (सुमन राजे)
  • हिंदी साहित्य का मौखिक इतिहास (नीलाभ)
  • हिंदीसाहित्य का ओझल नारी इतिहास (नीरजा माधव)
  • मॉडर्न हिंदी लिटरेचर( डॉ इंद्रनाथ मदान)
  • हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास(गणपतिचंद्र गुप्त)
  • साहित्य का इतिहास दर्शन(नलिन विलोचन शर्मा)
        हिन्दी साहित्य का कालविभाजन व नामकरण -

हिंदीसाहित्य के आरंभिककाल को जॉर्ज ग्रियर्सन ने चारणकाल नाम देते हुए इसकी समय सीमा 700 से 1300 ई मानी व इसमें अंतर्गत 9 कवियों को स्थान दिया जो निम्नांकित हैं--- 
1 पुष्यकवि
2 खुमाण
3 कुमारपाल
4 केदारभट्ट
5 अनन्य दास
6 चंदवरदाई
7 शारंगधर
8 जोधराज
9 जगनिक
 ग्रियर्सन ने इस समय के साहित्य का नामकरण चारणकाल, मुगलकाल, महारानी विक्टोरिया के शासन में हिंदुस्तान, कम्पनी के शासन में हिंदुस्तान आदि नामों से किया
मिश्रबन्धुओं का कालविभाजन व नामकरण

1 प्रारंभिक काल (700-1444 विक्रमी संवत)
2 माध्यमिक काल (1445 - 1680 वि स)
3 अलंकृतकाल (1681-1889 वि स )
4 परिवर्तन काल (1890 से 1924 विक्रम संवत)
5 वर्तमान काल (1926 विक्रम संवत से वर्तमान तक)

आचार्य शुक्ल का नामकरण व कालविभाजन
1 वीरगाथाकाल (1050 से 1375 विक्रमी संवत)
2 पूर्वमध्यकाल या भक्तिकाल (1375 से 1700 वि स )
3 उत्तरमधकाल या रीतिकाल (1700 से 1900 )
4 आधुनिक काल या गध्यकाल (1900 से 1984 वि स)

डॉ नगेन्द्र का कालविभाजन व नामकरण
1 आदिकाल - सातवी शती के मध्य से चौदहवीं शती के मध्य तक
2 भक्तिकाल - चौदहवीं शती के मध्य से सत्रहवीं शती मध्य तक
3 रीतिकाल -  17 वीं शती मध्य से 19 वीं शती मध्य तक
4 आधुनिक काल - 19 वीं शती के मध्य से अबतक
              भारतेंदुकाल या पुनर्जागरण काल -1857 से  1900 ई
             द्विवेदी युग या जागरण सुधारकाल - 1900 से 1918 ई
           छायावाद -1918 से 1938 ई
         प्रगतिवाद -1938 स 1943 ई
      प्रयोगवाद - 1943 से 1953 ई
    नवलेखनकल - 1953 से अब तक

आदिकाल का नाम व नामकरणकर्ता 
1 चारणकाल-------------------जॉर्ज ग्रियर्सन
2 संधि व चारणकाल ---------रामकुमार वर्मा
3 सिद्ध व सामंतकाल --- ---- राहुल सांकृत्यायन
4 प्रारंभिक काल ---------------मिश्रबन्धु
5 बीजवपनकाल ---------------महावीरप्रसाद द्विवेदी
6 वीरकाल ----------------------विश्वनाथ प्रसाद मिश्र
7 आधार काल ------------------सुमनराजे
8 वीरगाथाकाल ---------------- आचार्य रामचंद्र शुक्ल
9 आदिकाल--------------------- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
10 अपभ्रंशकाल ----------------डॉ बच्चन सिंह

रीतिकाल व इसके नामकर्ता
1 रीतिकाव्य--------------- -------जॉर्ज ग्रियर्सन
2 अलंकृतकाल -------------------मिश्रबन्धु
3 श्रृंगारकाल---------------------- विश्वनाथप्रसाद मिश्र
4 कलाकाल -- --------------------रामशंकर शुक्ल रसाल
5 रीतिकाल ------------------------ रामचंद्र शुक्ल
---------------------------------------------------------------------------------------
अपभ्रंश साहित्य

स्वयंभू को अपभ्रंश भाषा का प्रथम कवि माना जाता है जिनका समय 738ई लगभग माना जाता है
स्वयंभू को ही अपभ्रंश भाषा का वाल्मीकि व व्यास कहा जाता है साथ ही जैन साहित्य का भी प्रथम कवि माना जाता है 
स्वयंभू की भाषा संधा भाषा कहलाती है जिसमे स्वयंभू ने तीन ग्रंथों की रचना की है
 1 पउम चरिउ
 2 रिट्ठनेमि चरिउ
 3 स्वयम्भू छन्द 
इनमें से पहले ग्रंथ को स्वयंभू के पुत्र त्रिभुवन ने पूर्ण किया जिसमे राम के चरित्र का वर्णन समाहित है।
स्वयंभू ने अपनी भाषा को देशी भाषा से सम्बोधित किया है।
पुष्य या पुण्ड्र को शिवसिंह सेंगर ने हिंदी का प्रथम कवि माना है तथा  पुष्य को भाखा की जड़ कहा।
अनेक विद्वान पुष्य य पुंड्र को ही पुष्पदंत मानते हैं जिसका समय लगभग 927 ई माना जाता है।
पुष्पदंत को कविकुल तिलक, काव्यरत्नाकर, अभिमानमेरु आदि अन्य नामों से भी जाना जाता है। इन्हें हिंदी का भवभूति भी कहा जाता है।पुष्पदंत में ग्रन्थों में चौपाई छन्द का प्रयोग मिलता है।
पुष्पदंत के 3 ग्रन्थ मिले है 
1 महापुराण
2 जस हर चरिउ
3 णयकुमार चरिउ
इनमें से महापुराण ग्रन्थ में 63 महापुरुषों के जीवन का चरित्र चित्रण किया गया है।

धनपाल दसवीं शती में अपभ्रंश के तीसरे प्रमुख कवि हैं जिन्होंने भविसयत्त कहा नामक ग्रंथ की रचना की। 

जिनदत्त सूरी - जिनदत्त सूरी अपभ्रंश काल के कवि हैं जिन्होंने उपदेशरसायन रास नामक रास काव्य की रचना की जो 12 वीं शती में लिखित जैन रास काव्यपरंपरा का प्रथम ग्रन्थ माना जाता है, इसे ही अपभ्रंश भाषा का पहला रास काव्य भी कहते हैं। ये रचना नृत्य गीत रासलीला काव्य है।
शालिभद्र सूरी - शालिभद्र सूरी अन्य जैन कवि हैं जिनका महत्वपूर्ण जैन ग्रन्थ भरतेश्वर बाहुबली रास है । इसी जैन ग्रंथ द्वारा रास काव्यपरंपरा का हिंदी में प्रवर्तन माना जाता है।

अपभ्रंश काल में जैन कवियों के इतर किसी मुस्लिम रचनाकार द्वारा रचित पहला जैन धर्म इतर रासकाव्य संदेश रासक है जिसके रचनाकार अब्दुल रहमान हैं। संदेश रासक में विक्रमपुर की रानी के वियोग का वर्णन है, अतः यह एक प्रकार का खण्डकाव्य है।
मुनिरामसिंह-रामसिंह पाहुड़ दोहा नामक जैन ग्रन्थ के रचयिता हैं, ये रहस्यवादी कवि भी माने जाते हैं।
जोइन्दु-जोइन्दु को अपभ्रंश भाषा में दोहा काव्य का आरम्भकर्ता माना जाता है। इनके द्वारा दो ग्रंथों की रचना की गई - 1- परमात्म प्रकाश, 2 - योगसार। इनका समय लगभग छठी शताब्दी माना गया है











01 दिसंबर 2020

कबीर के विषय में प्रसिद्ध कथन :





 ★ कबीर धर्मोपदेशक थे - शुक्ल
प्रतिभा उनमें बड़ी प्रखर थी - शुक्ल

★ तार्किकता के क्षेत्र में अत्यंत शुष्क,तीक्ष्ण एवं हृदय हीन प्रतीत होने वाले कबीर भक्ति की भावधारा  में बहते समय सबसे आगे दिखाई पड़ते हैं और अपनी निरक्षरता की खुले आम घोषणा करते हुए भी जब आवेश में आते हैं तो रूपको अलंकारों  और प्रतीकों की ऐसी  झड़ी लगा देते हैं मानो वे सारे काव्य शास्त्र में पारंगत हो । वे युगावतार की विशेष क्षमता लेकर अवतरित हुए थे* - गणपति चन्द्र गुप्त

 ★ कबीर प्रधानत :उपदेशक और समाज सुधारक थे - लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय

★यह कहना कि वे समाज सुधारक थे ग़लत है l यह कहना कि वे धर्म सुधारक थे और भी गलत है l यदि सुधारक थे तो रैडिकल सुधारक - डॉ बच्चन सिंह

" हिंदी साहित्य के हज़ार वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई उत्पन्न नही हुआ।महिमा में यह व्यक्तित्व केवल एक ही प्रतिद्वंद्वी जानता है - तुलसीदास।"-हजारी प्रसाद (कबीर)

कबीर मस्तमौला थे l जो कुछ कहते थे साफ कहते थे - हजारी प्रसाद द्विवेदी

कबीरदास मुख्य रूप से भक्त थे l वे उन निरर्थक आचारों को व्यर्थ समझते थे जो असली बात को ढँक देते हैं और झूठी बातों को प्राधान्य दे देते हैं - हजारी प्रसाद जी

कबीर अपने युग के सबसे बड़े क्रांतदर्शी थे - हजारी प्रसाद जी

वे मुसलमान होकर भी असल मुसलमान नहीं थे l वे हिंदू होकर भी हिंदू नहीं थे l वे साधु होकर भी साधु नहीं थे l वे वैष्णव होकर भी वैष्णव नहीं थे l वे योगी होकर भी योगी नहीं थे l वे कुछ भगवान् की ओर से ही सबसे न्यारे बनाकर भेजे गए थे - हजारी प्रसाद जी

वे (कबीर) भगवान् के नृसिंहावतार की मानो प्रतिमूर्ति थे - हजारी प्रसाद जी

कबीर में काव्य - कम काव्यानुभूति अधिक है - लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय

कबीर रहस्यवादी संत और धर्मगुरू होने के साथ साथ वे भावप्रवण कवि भी थे - डॉ बच्चन सिंह

ये महात्मा बड़ी स्वतंत्र प्रकृति के थे l ये रुढ़िवाद के कट्टर विरोधी थे - बाबू गुलाब राय

कबीर पढ़े लिखे नहीं थे, उन्हें सुनी सुनाई बातों का ज्ञान था, वे मूलतः समाज सुधारक थे - एेसी उक्तियाँ कबीर के विवेचन और मूल्यांकन में अप्रासंगिक बिंदु है - रामस्वरूप चतुर्वेदी

"कबीर के समकक्ष गोस्वामी तुलसीदास है l"-डॉ बच्चन सिंह

कबीर में, कई तरह के रंग है, भाषा के भी और संवेदना के भी l हिंदी की बहुरूपी प्रकृति उनमें खूब खुली है l -रामस्वरूप चतुर्वेदी‘‘

कबीर   सच्चे   समाज   सुधारक   थे  जिन्होंने दोनो   धर्मों   हिन्दू - मुस्लिम   की   भलाई   बुराई   देखी   एवं   परखी   और   केवल   कटु   आलोचना   ही   नहीं   की   अपितु   दोनों धर्मावलम्बियों   को   मार्ग   दिखलाया।   जिस   पर   चलकर   मानव   मात्र   ही   नहीं   समस्त   प्राणी   जगत   का   कल्याण   हो   सकता   है।-द्वारिका प्रसाद सक्सेना

वे साधना के क्षेत्र में युग - गुरु थे और साहित्य के क्षेत्र में भविष्य के सृष्टा - हजारी प्रसाद द्विवेदी

"लोकप्रियता में उनके (कबीर) समकक्ष गोस्वामी तुलसीदास है l तुलसी बड़े कवि हैं, उनका सौंदर्यबोध पारम्परिक और आदर्शवादी है l कबीर का सौंदर्यबोध अपारंपरिक और यथार्थवादी है l"- डॉ बच्चन सिंह

कबीर ही हिंदी के सर्वप्रथम रहस्यवादी कवि हुए - श्याम सुंदर दास

" आज तक हिंदी में ऐसा जबर्दस्त व्यंग्य लेखक नहीं हुआ " - हजारीप्रसाद द्विवेदी

कबीर अपने युग के सबसे बड़े क्रांतदर्शी थे - हजारी प्रसाद

"समूचे भक्तिकाल में कबीर की तरह का जाति - पाँति विरोधी आक्रामक और मूर्तिभंजक तेवर किसी का न था l जनता पर तुलसी के बाद सबसे अधिक प्रभाव कबीर का था l"-बच्चन सिंह

कबीर पहुँचे हुए ज्ञानी थे l उनका ज्ञान पोथियों की नकल नहीं था और न वह सुनी सुनाई बातों का बेमेल भंडार ही था -श्याम सुंदर दास
कबीर संत पहले थे, कवि बाद में - रामकुमार वर्मा

कबीर एक अच्छे संत और समाज सुधारक थे - रामशंकर शुक्ल रसाल 

संतमत के समस्त कवियों में कबीर सबसे अधिक प्रभावशाली एवं मौलिक थे - डॉ नगेंद्र

जिनकी जाति नहीं होती, कबीर ऐसे थे - ग्रियर्सन

"कबीर दार्शनिक न होकर आध्यात्मिक पुरुष मात्र हैं - पीतांबर दत्त बड़थ्वाल

"संत कवियों में कबीर के बाद के कवि वैसे ही दिखाई पड़ते हैं जैसे चंद्रोदय के बाद नक्षत्रमालिकाएँ l"- बच्चन सिंह 

"हिन्दुओ और मुसलमानो की साम्प्रदायिक सीमा को तोड़कर उन्हें एक ही भावधारा में बहाने की शक्ति कबीर में है"-डॉ रामकुमार वर्मा

एक नाम की रचनाएं, विधा और लेखक/कवि

     ●मुक्ति पथ (नाटक)~उदयशंकर भट्ट
   ●मुक्ति पथ (उपन्यास)~इलाचंद्र जोशी
 ●मुक्ति पर्व (उपन्यास)~मोहनदास नैमिशराय
●मुक्ति प्रसंग (काव्य)~राज कमल चौधरी

●झूठा सच (उपन्यास)~यशपाल
 ●झूठ सच (निबंध)~सिया राम शरण गुप्त

●काली आँधी (उपन्यास)~कमलेश्वर
 ●पीली आँधी (उपन्यास)~प्रभाखेतान

●द्रौपदी (प्रबंध काव्य)~नरेंद्र शर्मा
  ●द्रौपदी (उपन्यास)~प्रतिभा राय
    ●द्रौपदी (नाटक)~सुरेंद्रवर्मा
  ****अनित्य (उपन्यास)~मृदुला गर्ग
  ****अनित्य (कहानी)~ बदी उज्जमा

●बाँधो न नाव इस ठाँव (उपन्यास)~उपेन्द्र नाथ अश्क
 ●बाँधो न नाव इस ठाँव (काव्य)~निराला

●संन्यासी (उपन्यास)~इलाचंद्र जोशी
  ●संन्यासी (नाटक)~लक्ष्मी नारायण मिश्र
    ●युवा संन्यासी (नाटक)~कैलाश वाजपेयी
      ●उर्वशी (काव्य)~प्रसाद

●रश्मि (काव्य)~महादेवी
 ●रश्मि रथी (काव्य)~दिनकर

●पिता (कहानी)~ज्ञानरंजन, महीप सिंह, धीरेन्द्र अस्थाना
 ●केवल पिता ( कहानी)~सेवाराम यात्री

●पिता दर पिता (कहानी)~रमेश वक्षी
  ●दीपशिखा (काव्य)~महादेवी
   ●दीपशिखा (नाटक)~रेवती शरन शर्मा



 **त्रिशंकु (कथा संग्रह)~मन्नू भंडारी
    ●त्रिशंकु (नाटक)~ब्रजमोहनसिंह
      ●त्रिशंकु (निबंध)~अज्ञेय

22 नवंबर 2020

उतरमध्य काल - रीतिकाल

                                   1700-1900 वि. आचार्य शुक्ल के अनुसार

सर्वमान्य मत 1650-1850 ई . डाॅ. नगेन्द्र
अन्य नाम -
उतरमध्य काल-रीतिकाल - आचार्य शुक्ल
अलंकृत काल - मिश्र बंधु
श्रृंगार काल - विश्वनाथ प्रसाद मिश्र
समर्थक हजारी प्रसाद द्विवेदी
‘रीति’ का अर्थ है - काव्यांग निरूपण
रीति काल की प्रथम रचना कृपाराम की ‘हिततरंगिणी’ को माना है।
रीतिकाल का प्रवर्तक ‘चिन्तामणी’ को माना जाता है।
रीतिकाल की अंतिम कृति ‘ग्वाल’ कवि की ‘रसरंग’ है।
मूलभूत अंतिम कवि ‘पद्माकर’ को माना जाता है।
रीतिकाल का वर्गीकरण -
रीतिबद्ध काव्य धारा -
इस वर्ग के कवियों ने काव्यांग निरूपण को आधार मानकर लक्षण ग्रंथों की रचनाएं की।
प्रमुख कवि:-
- चिन्तामणी (प्रथम कवि)
- मतिराम
- देव
- ग्वाल
- केशवदास
- मंडन
- भिखारीदास, जसवंतसिंह
रीतिमुक्त कवि -
इस वर्ग में वे कवि आते हैं जिन्होने काव्यागं निरूपण करने वाले ग्रंथों की रचना न करके स्वछंद रूप से रचनाएं लिखी।
प्रमुख कवि -
- घनानंद
- बोधा
- आलम
- ठाकुर
रीतिसिद्ध काव्यधारा -
इस वर्ग में वे कवि आते हैं जिन्हें रीति की जानकारी तो थी लेकिन लक्षण ग्रंथ नहीं लिखे।
प्रमुख कवि -
- बिहारी
- सेनापति
- रसनिधि
- नेवाज
- परजेन
प्रमुख रचनांए एंव कवि -
1. चिन्तामणि - रसविलास, काव्यप्रकाश
2. भूषण - शिवराज भूषण, शिवा बावनी, छत्रषाल दशक
3. मतिराम - रसराज, ललितललांग, फूल मंजरी
4. बिहारी - बिहारी सतसई
5. बोधा - ईश्कनामा, विरहवारिस
6. रसलीन - अंगदर्पण
7. घनानंद - वियोगवेलि, प्रितिपावस, सुजानहित प्रबंध, घनानंद पदावली
8. पद्माकर/पद्याकर- जगतविनोद, पद्माभरण, प्रबोधपचासा, गंगालहरी
रीतिकाल की प्रमुख प्रवृतियाँ -

26 सितंबर 2020

हिन्दी साहित्य के परीक्षोपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य जो प्रतियोगी परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी हैं---–-


  • 1.आचार्य शुक्ल ने आदिकाल में देशभाषा काव्य में कितनी पुस्तकों की संख्या मानी है~~8
  • 2.” जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब ही साहित्य हैं “यह माना है~~ शुक्ल
  • 3.” भाषा सर्वेक्षण “के रचयिता है~~ जॉर्ज ग्रियर्सन
  • 4. पृथ्वीराज रासो कितने प्रकार के छंदों में लिखा गया है~~68
  • 5. उपदेश रसायन रास के रचयिता है~~ जिनदत्त सूरी
  • 6.पृथ्वीराज रासो काव्य किस कोटि का है~~वीरगाथा महाकाव्य
  • 7.”हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास ” ग्रंथ के लेखक है~~ रामकुमार वर्मा
  • 8.इतिहास लेखन की सबसे विकसित पद्धति है ~~विधेयवादी पद्धति
  • 9. विद्यापति ने कीर्तिलता को किस संवाद रूप में लिखा है ~~भृंग-भृंगी
  • 10.” राठौड़ा री ख्यात” के रचयिता है ~~दयालदास
  • 11. नाथों में “रसायनी” कौन थे ~~नागार्जुन
  • 12. कविराज श्यामलदास तथा काशी प्रसाद जायसवाल ने रासो की उत्पत्ति मानी है~~ रहस्य से
  • 13. “आध्यात्मिक रंग के चश्मे आजकल बहुत सस्ते हो गए हैं उन्हें चढ़ाकर कुछ लोगों ने गीतगोविंद के पद्यों को आध्यात्मिक संकेत बताया है वैसे ही विद्यापति के पद्यों को भी”- पंक्ति है ~~आचार्य शुक्ल
  • 14.काफिर बोध, पंचअग्नि, दयाबोध,अष्ट चक्र व रसराह ग्रंथ है ~~गोरखनाथ
  • 15. कयमास वध किस रचना का खंड है~~ पृथ्वीराज रासो
  • 16. उक्ति व्यक्ति प्रकरण के रचयिता है~~ दामोदर शर्मा
  • 17. “मनहुं कला ससीभान कला सोलह सो बनिय “- पंक्ति है~~ चंदबरदाई
  • 18. “राउलबेल”श्रृंगार परक चंपू काव्य के रचयिता है ~~रोडा कवि
  • 19. अपभ्रंश भाषा का प्रथम कवि माना जाता है ~~स्वयंभू
  • 20. स्वयं को ‘अभिमान मेरु’ कहा करते थे~~ पुष्पदंत

  • 21. आदिकाल को संधिकाल एवं चारण काल किसने कहा ~~रामकुमार वर्मा
  • 22. बौद्ध सिद्धों के पदों और दोहों को ‘ बौद्धगान ओ दोहा’ नाम से बांग्ला भाषा मे प्रकाशित किया~~ पंडित हरप्रसाद शास्त्री
  • 23. किरान- उस- सादेन रचना है ~~अमीर खुसरो
  • 24. ‘पुरुष परीक्षा’ किसकी संस्कृत में रचित रचना है~~ विद्यापति
  • 25. रिठेमणि चरिउ के रचयिता है~~ स्वयंभू
  • 26. कीर्तिलता की भाषा है ~~अवहट्ट
  • 27.भू- परिक्रमा के रचयिता है ~~विद्यापति
  • 28. जयमयंक जस चंद्रिका के रचयिता है~~ मधुकर कवि
  • 29. इयाश्रय काव्य की रचना की है~~ हेमचंद्र
  • 30. ‘कुमारपाल प्रतिबोध’ गद्य पद्य में प्राकृत काव्य लिखा है~~ सोमप्रभ सुरि

  • 31. गोरखनाथ में किसके योग का सहारा लेकर ‘हठयोग’ का प्रवर्तन किया~~ पतंजलि
  • 32. ‘रत्नाकर जोपम कथा’ किस संप्रदाय का मानक ग्रंथ है~~ सिद्धों का
  • 33.” जिमि लोण बिलिज्जई पाणी एहि तिमि धरणी लई चित्त” कथन है ~~कणहप्पा
  • 34. “गंगा जऊना माझे बहई रे नाइ”है- उक्ति है~~ डोम्भीपा
  • 35. “काआ तरुवर पंच बिड़ाल” उक्ति है~~ लुइपा
  • 36. सिद्धों में सबसे पुराने माने जाते हैं~~ सरहपा
  • 37. अपभ्रंश नाम पहले-पहल किस के शिलालेख में मिलता है~~ वल्लभी राजा धारसेन द्वितीय
  • 38. “उस समय जैसे ‘गाथा’ या ‘गाहा’ कहने से प्राकृत का बोध होता था वैसे ही दोहा या दूहा कहने से अपभ्रंश का” कथन के लेखक है~~ रामचंद्र शुक्ल
  • 39. ‘देशी नाममाला’ किसकी रचना है~~ हेमचंद्र
  • 40. हजारी प्रसाद द्विवेदी, विश्वनाथ प्रसाद मिश्र तथा चंद्रबली पांडेय ने रासो की उत्पत्ति मानी है~~ रासक

  • 41. हरप्रसाद शास्त्री ने रासो की उत्पत्ति मानी है~~ राजयश
  • 42.आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रासो की उत्पत्ति मानी है ~~रसायण
  • 43. पृथ्वीराज रासो की रचना विधान में सर्वाधिक विवादास्पद पक्ष है~~ ऐतिहासिकता
  • 44. ‘कन कंड चरिउ’ के रचयिता है~~ कनकामर मुनि
  • 45.’प्राकृत प्रकाश’ के रचयिता ~~वररुचि
  • 46. ढोला मारु रा दुहा के रचयिता~~ कुशललाभ
  • 47. सबसे पहले बारहमासा वर्णन किस रचना में मिलता है ~~बीसलदेव रासो 
  • 48. आदिकाल को अपभ्रंश काल कहा ~~धीरेंद्र वर्मा
  • 49. बारह बरीस लौ कूकर जीवे, और तेरह लौ जिये सियार।
  • बरिस अठारह छत्री जीवे, आगे जीवन को धिक्कार।। उक्त पंक्ति है~~जगनिक
  • 50. आदिकाल को ‘बीजवपन काल’ कहा है~~महावीर प्रसाद द्विवेदी

  • 51. दोहाकोश किसकी रचना है ~~सरहपा
  • 52. मैथिल कोकिल कहे जाते हैं ~~विद्यापति
  • 53.रणमल छंद की रचना की~~ श्रीधर
  • 54. आल्हाखंड नाम से कौन सी रचना प्रसिद्ध है~~ परमाल रासो
  • 55. “पद्मावती समय” किस रचना का खंड है~~ पृथ्वीराज रासो
  • 56. राजमती और बीसलदेव की कथा किस ग्रंथ में है~~ बीसलदेव रासो
  • 57.वर्ण रत्नाकर ग्रंथ के रचयिता है~~ ज्योतिरीश्वर
  • 58. नाथ- संप्रदाय के रचयिता है~~ हजारी प्रसाद द्विवेदी
  • 59. शिलांकित चंपू गेय काव्य रचना है~ राउलबेल
  • 60. दो सुखने, खलिकबारी आदि रचनाएं हैं~ अमीर खुसरो

  • 61. प्राण-संकली,सबदी, नरवैबोध, आत्मबोध और पंचमात्रा रचनाएं हैं~~ गोरखनाथ
  • 62.गोरखनाथ की रचनाओं को ‘गोरखबानी’ नाम से संपादित किया ~~पीतांबर दत्त बड़थ्वाल
  • 63.”पुस्तक जल्हण हत्थ दै, चलि गज़्ज़न नृज काज” पंक्ति है~ जल्हण
  • 64. ‘चन्द हिंदी के प्रथम महाकवि माने जाते हैं और इनका पृथ्वीराज रासो हिंदी का प्रथम महाकाव्य है’ कथन के लेखक है~~ आचार्य शुक्ल
  • 65.’पृथ्वीराज रासो’ को डॉक्टर श्यामसुंदर दास, मोहनलाल विष्णु लाल पंड्या, मिश्र बंधुओं एवं कर्नल टॉड मानते हैं~~ प्रामाणिक
  • 66.हजारी प्रसाद द्विवेदी, मुनि जिन विजय, सुनीति कुमार चटर्जी आदि ‘पृथ्वीराज रासो’ को मानते हैं~~ अर्धप्रमाणिक
  • 67.पृथ्वीराज रासो में कितने सर्ग या समय है~~69
  • 68.”बज़्ज़िय घोर निसान रान चौहान चहुँ दिसि” पंक्ति है~~ चंदबरदई
  • 69. संदेश रासक किस प्रकार का काव्य है~~ खंडकाव्य
  • 70. पृथ्वीराज रासो को पूरा किया था~~ जल्हण ने

  • 71.’परमात्म-प्रकाश’ और ‘योगसार’ किसकी रचना है~~ जोइंदु
  • 72. पाहुड़दोहा के रचयिता है~~ मुनि रामसिंह
  • 73. सरहपाद,सरोजवज्र व राहुलभद्र आदि नामों से कौन जाना जाता है~`सरहपा
  • 74.अक्षरद्विकोपदेश,डोम्बिगीतिका व योगचार्य किसकी रचनाएं हैं~~डोम्बिपा
  • 75. ‘श्रावकाचार’ व दब्ब-सहाव-पयास, लघुनयचक्र और दर्शनसार ग्रन्थ है~~देवसेन
  • 76. भरतेश्वर-बाहुबली रास खंड काव्य ग्रंथ लिखा~~ शालिभद्र सूरी
  • 77. ‘स्थूलीभद्र रास’ किसकी रचना है~~ जिनधर्म सुरि
  • 78. रेवंतगिरी रास रचना है ~~विजयसेन सुरि
  • 79. ‘नेमिनाथ रास’ नामक ग्रंथ की 58 छंदों में रचना की~~सुमतिगणि
  • 80. नाथ संप्रदाय को ‘अवधूत संप्रदाय’, ‘योग संप्रदाय’ कहा है~~ हजारी प्रसाद द्विवेदी

  • 81. डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा किस रचना में हिंदी साहित्य को अखिल भारतीय साहित्य से सम्बद्ध करने का प्रयास हुआ है~~ हिंदी साहित्य की भूमिका
  • 82.’आधुनिक हिंदी साहित्य का विकास’ किसके द्वारा लिखित है~~ श्री कृष्णलाल
  • 83.’हिंदी पुस्तक साहित्य’ को आधुनिक साहित्य संपत्ति का बीजक किसने कहा है~~ डॉ• माता प्रसाद गुप्त
  • 84.’हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास’ लिखा गया~~ डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी
  • 85.’हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास’ में संपूर्ण इतिहास को डॉ. गणपति चंद्र गुप्त ने कितने काल खंडों में विभाजित किया है~~ आदिकाल, मध्यकाल और आधुनिक काल
  • 86.हिंदी साहित्य का सर्वाधिक व्यवस्थित और प्रथम इतिहास है~~ हिंदी साहित्य का इतिहास(शुक्ल)
  • 87.अपभ्रंश साहित्य को हिंदी साहित्य से अलग मानकर उसे पूर्व पीठिका के रूप में किसने प्रस्तुत किया ~~आचार्य शुक्ल
  • 88.आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने काल विभाजन का प्रधान आधार क्या माना~~ जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन को
  • 89.शुक्ल कृत हिंदी साहित्य का इतिहास में आदिकाल का नाम जो सर्वाधिक विवादास्पद रहा ~~वीरगाथाकाल
  • 90.’हिंदी के मुसलमान कवि’ नामक पुस्तक के लेखक है~~ गंगा प्रसाद सिंह

  • 91.हिंदी साहित्य का कौनसा इतिहास ग्रंथ एक पुस्तक के रूप में सबसे बड़ा है~~ हिंदी साहित्य का इतिहास (रमाशंकर शुक्ल रसाल)
  • 92.राजस्थानी साहित्य की रूपरेखा के लेखक हैं~~ मोतीलाल मेनारिया
  • 93.हिंदी साहित्य इतिहास में दोहरे नामकरण की प्रवृत्ति का आरंभ किसने किया~~ आचार्य शुक्ल
  • 94.हजारी प्रसाद द्विवेदी का कौनसा ग्रंथ एक व्याख्यान ग्रंथ है~~ हिंदी साहित्य का आदिकाल
  • 95.अपभ्रंश को पुरानी हिंदी माना~~ चंद्रधर शर्मा गुलेरी
  • 96.आचार्य शुक्ल ने आदिकाल के कितने ग्रंथों को प्रामाणिक माना है ~~12
  • 97.’द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान’ किसके द्वारा रचित है जिसमें केवल हिंदी कवियों का उल्लेख है~~ ग्रियर्सन
  • 98.द मार्डन वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान सन 1888 में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल की पत्रिका के रूप में प्रकाशित हुआ
  • 99.हिंदी साहित्य के इतिहास में काल विभाजन का सर्वप्रथम प्रयास किया~~ग्रियर्सन
  • 100.’तज़किरा-ई-शुअराई हिंदी’ किसके द्वारा रचित इतिहास ग्रंथ है~~ मौलवी करीमुद्दीन