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22 नवंबर 2020

उतरमध्य काल - रीतिकाल

                                   1700-1900 वि. आचार्य शुक्ल के अनुसार

सर्वमान्य मत 1650-1850 ई . डाॅ. नगेन्द्र
अन्य नाम -
उतरमध्य काल-रीतिकाल - आचार्य शुक्ल
अलंकृत काल - मिश्र बंधु
श्रृंगार काल - विश्वनाथ प्रसाद मिश्र
समर्थक हजारी प्रसाद द्विवेदी
‘रीति’ का अर्थ है - काव्यांग निरूपण
रीति काल की प्रथम रचना कृपाराम की ‘हिततरंगिणी’ को माना है।
रीतिकाल का प्रवर्तक ‘चिन्तामणी’ को माना जाता है।
रीतिकाल की अंतिम कृति ‘ग्वाल’ कवि की ‘रसरंग’ है।
मूलभूत अंतिम कवि ‘पद्माकर’ को माना जाता है।
रीतिकाल का वर्गीकरण -
रीतिबद्ध काव्य धारा -
इस वर्ग के कवियों ने काव्यांग निरूपण को आधार मानकर लक्षण ग्रंथों की रचनाएं की।
प्रमुख कवि:-
- चिन्तामणी (प्रथम कवि)
- मतिराम
- देव
- ग्वाल
- केशवदास
- मंडन
- भिखारीदास, जसवंतसिंह
रीतिमुक्त कवि -
इस वर्ग में वे कवि आते हैं जिन्होने काव्यागं निरूपण करने वाले ग्रंथों की रचना न करके स्वछंद रूप से रचनाएं लिखी।
प्रमुख कवि -
- घनानंद
- बोधा
- आलम
- ठाकुर
रीतिसिद्ध काव्यधारा -
इस वर्ग में वे कवि आते हैं जिन्हें रीति की जानकारी तो थी लेकिन लक्षण ग्रंथ नहीं लिखे।
प्रमुख कवि -
- बिहारी
- सेनापति
- रसनिधि
- नेवाज
- परजेन
प्रमुख रचनांए एंव कवि -
1. चिन्तामणि - रसविलास, काव्यप्रकाश
2. भूषण - शिवराज भूषण, शिवा बावनी, छत्रषाल दशक
3. मतिराम - रसराज, ललितललांग, फूल मंजरी
4. बिहारी - बिहारी सतसई
5. बोधा - ईश्कनामा, विरहवारिस
6. रसलीन - अंगदर्पण
7. घनानंद - वियोगवेलि, प्रितिपावस, सुजानहित प्रबंध, घनानंद पदावली
8. पद्माकर/पद्याकर- जगतविनोद, पद्माभरण, प्रबोधपचासा, गंगालहरी
रीतिकाल की प्रमुख प्रवृतियाँ -