साहित्य की कोई सटीक परिभाषा नहीं दी जा सकती । विद्वानों के अनुसार जिस लिखित ग्रंथ या रचना में सभी के हित की बात हो और उसमें कलात्मकता, रमणीयता, सौंदर्यता आदि अपनी पूरी सम्पूर्णता में हो तो उस ग्रंथ या रचना को साहित्य की संज्ञा दी जा सकती है।
यह ब्लॉग हिन्दी साहित्य व हिन्दी व्याकरण से संबंधित कॉलेज, यूनिवर्सिटी के साथ साथ अन्य सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए लिखा जा रहा है। ब्लॉग लिखने वाले लेखक अपने विषय के अनुभवी शिक्षक हैं।
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10 दिसंबर 2018
05 दिसंबर 2018
साहित्य का महत्त्व
साहित्य और समाज का सम्बन्ध अन्योन्याश्रित है। साहित्य में सामाजिक प्रगति- अवनति , अच्छा-बुरा, आशा- निराशा आदि के भाव रहते हैं । समाज की सोई हुई चेतना को प्रज्ज्वलित करना साहित्य का मूल उद्देश्य है।
साहित्य का सबसे बड़ा योगदान होता है कि वह पाठक को संवेदनशील बनाता है। साहित्य की शक्ति इसमें है की वह पाठक को भी समस्या के प्रति संवेदनशील बना देता है । कविता गरीब के प्रति संवेदनशीलता पैदा करती है। साहित्य का दूसरा महत्वपूर्ण योगदान यह है कि यह समाज को सही दिशा देता है, साहित्य अपनी विकसित संवेदनशीलता के कारण अपने समय की विसंगतियों की पहचान कर लेता है। आम आदमी को तैयार करने में सक्रिय रूप से हिस्सा लेता है। स्वाधीनता आंदोलन के दौर में हिंदी कविता ना सिर्फ आजादी के लिए वैचारिक ऊर्जा प्रदान करती है बल्कि सामान्य जन को जोश से भरने का कार्य भी करती है।
साहित्य का एक महत्वपूर्ण योगदान यह भी है कि उसने समय के अनुकूल नए-नए विचारों को पूर्ण करने में सक्रिय भूमिका निभाई है। तुलसीदास जी ने भक्तिकाल में पहली बार गरीबी जैसी समस्या पर विस्तृत चिंतन किया है। भारतेन्दु युग के कवियों ने साम्राज्यवाद के खिलाफ, प्रगतिवादी कवियों ने पूंजीवाद के शोषित चरित्र व आर्थिक असमानता के खिलाफ वैचारिक लड़ाई लड़ी है। हिंदी कविता पाठक को विचारों की ऊर्जा से संपन्न करना चाहती है।
साहित्य केवल प्रगतिशील विचारों का समर्थन नहीं करता है बल्कि प्रगति विरोधी विचारों का खंडन भी करता है। प्रगतिशील साहित्यकारों ने प्रारंभ से ही अपने अपने समय की जरूरतों को पहचान कर उन पर कड़ी चोट की है। निर्गुण कवियों ने अपने समय के धार्मिक - सामाजिक बाह्याचारों व कर्मकांडों , भेदभावों , आडम्बरो का विरोध तीव्र और तीखी भाषा शैली में किया है। इसी प्रकार जाति व्यवस्था तथा वर्ण व्यवस्था पर चोट करते हुए निराला भी कई बार लिख चुके हैं। साहित्य का एक योगदान यह भी है की यह मनोरंजन के माध्यम से पाठक के मन में प्रेम , अनुराग और रागात्मकता का संचार करता है तथा सुंदर जीवन जीने की लालसा पैदा करता है। साहित्य ही वर्तमान को सामने रखकर भविष्य की रूपरेखा तय करता है। प्रसिद्ध कथाकार मुंशी प्रेमचंद ने भी कहा है की साहित्य समाज के आगे चलने वाली ,उसका मार्ग प्रकाशित करने वाली मशाल है। इस प्रकार हिंदी साहित्य ने प्रत्येक युग में अपने सम्पूर्ण जिम्मेदारियों की पहचान की और संपूर्ण प्रतिबद्धता के साथ उनका निर्वाह किया है।
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