हिंदी साहित्येतिहास की परम्परा में इतिहास लिखने का पहला पहला प्रयास एक फ़्रांसिसी विद्वान गार्सा द तासी द्वारा किया गया था।
- फ़्रांसिसी विद्वान गार्सा द तासी ने अपने इस हिंदी साहित्येतिहास के ग्रन्थ का नाम इस्तवार द लितरेत्युर ऐन्दुई ऐन्दुस्तानी रखा था।
- यह हिंदी सहित्येतिहास की परम्परा का पहला इतिहास अवश्य था किन्तु मूलतः फ़्रांसिसी भाषा में लिखा गया था, ना की हिंदी भाषा में।
- यह ग्रन्थ वर्ष 1839 और 1847 में प्रकाशित हुआ था, इस प्रकार ये ग्रन्थ दो भागों में मिलता है..
- फ़्रांसिसी विद्वान गार्सा द तासी के इस ग्रन्थ में हिंदी के साथ साथ उर्दू के कवियों का भी उल्लेख है।
- 1847 में प्रकाशित दूसरे भाग को फिर तीन भागों में बाँट दिया गया जो आगे चलकर 1871 में प्रकाशित हुए।
- इसमें कवियों का विवरण अंग्रेजी वर्ण के क्रमानुसार दिया गया है।
- तासी के इस ग्रन्थ में कुल 738 कवियों का विवरण है किन्तु इनमें से हिंदी के केवल 72 कवि ही शामिल हैं , शेष उर्दू के कवि हैं.
- "हिन्दुई साहित्य का इतिहास ". :
- ↳ यह फ़्रांसिसी विद्वान गार्सा द तासी द्वारा लिखित इतिहास का हिंदी अनुवाद ग्रन्थ है।
- ↳ इस हिंदी अनुवाद के लेखक लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय हैं।
- ↳ यह हिंदी अनुवाद वर्ष 1952 में प्रकाशित हुआ था.
- फ़्रांसिसी विद्वान गार्सा द तासी के बाद हिंदी साहित्य इतिहास लेखन की परम्परा में जॉर्ज ग्रियर्सन का नाम आता है।
- जॉर्ज ग्रियर्सन ने द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान के नाम से हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा ।
- इसका प्रकाशन एशियाटिक सोसाईटी ऑफ बंगाल की पत्रिका के विशेषांक के रूप में हुआ था।
- इसका प्रकाशन वर्ष 1888 था।
- हिंदी के विद्वान इसे सही अर्थों में हिंदी साहित्य का पहला इतिहास बताते हैं, क्योंकि इसमें पहली बार कवियों और लेखकों का कालक्रमानुसार वर्णन किया गया है और काव्य प्रवृतियों का प्रयोग किया गया है, साथ ही अपने युग की परिस्थितियों का संकेत दिया गया है।
- इस ग्रन्थ में ग्रियर्सन ने हिंदी भाषा के अलावा अन्य भाषा के कवियों को शामिल नहीं किया है जैसे तासी ने किया था.
- इसमें लगभग 952 कवियों का जीवन चरित शामिल किया गया है।
- ग्रियर्सन ने हिंदी साहित्य के इतिहास को स्पष्ट करने के लिए उसे चरण काव्य , धार्मिक काव्य, प्रेमकाव्य , दरबारी काव्य आदि भागों में विभाजित किया है.
- वो लेखक जॉर्ज ग्रियर्सन ही थे जिन्होंने भक्तिकाल को सम्पूर्ण हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग घोषित किया था.
- "हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास "-------
- यह ग्रन्थ जॉर्ज ग्रियर्सन के इतिहास का हिंदी अनुवाद है.
- इसका हिंदी अनुवाद करने वाले विद्वान का नाम डॉ किशोरी लाल गुप्त है.
- यह हिंदी अनुवाद वर्ष 1957 में किया गया था।
- इसके बाद शिव सिंह सेंगर ने शिव सिंह सरोज नाम से हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा.
- य इतिहास वर्ष 1883 में सामने आया।
- इसमें लगभग 838 कवियों के बारे में चर्चा की गई है।
- इसके तत्पश्चात मिश्रबन्धु विनोद नामक इतिहास ग्रन्थ सामने आता है जिसके लेखक मिश्रबन्धु माने जाते है।
- मिश्रबन्धुविनोद का प्रकाशन हमें चार भागों में मिलता है।
- इन चार भागों में से पहले तीन भाग तो 1913 में ही प्रकाशित हो गए थे किन्तु चौथा भाग 1934 में जाकर प्रकाशित हुआ।
- इस इतिहास में लगभग एक हजार कवियों को शामिल किया गया है.
- आचार्य शुक्ल ने इस ग्रन्थ को भी कविवृत संग्रह की संज्ञा दी है।
- गणेशबिहारी मिश्र + श्यामबिहारी मिश्र + शुकदेव बिहारी मिश्र = मिश्रबन्धु
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा लिखित " हिंदी सहित्य का इतिहास " पहला व्यवस्थित इतिहास माना जाता है। यह इतिहास ऐतिहासिक और वैज्ञानिक दृष्टि से लिखा गया पहला इतिहास है और इस इतिहास को लिखने में शुक्लजी ने विधेयवादी पद्धति का प्रयोग किया था।
- यह इतिहास " हिंदी साहित्य का विकास " के शीर्षक से नागरी प्रचारणी सभा द्वारा वर्ष 1929 में प्रकाशित करवाया गया था. .
- हिंदी के इतिहास का सही कालविभाजन और सही नामकरण शुक्लजी के इतिहास की ही देन है .
- शुक्लजी ने द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान + शिवसिंह सरोज + मिश्रबन्धु विनोद जैसे आरंभिक इतिहासों को कविवृत संग्रह कहा है।
- "भाषा काव्य संग्रह " ---
- ↳ यह इतिहास हिंदी भाषा में लिखा पहला इतिहास ग्रन्थ है।
- ↳ खक -- महेशदत्त शुक्ल।
- ↳ प्रकाशन वर्ष ---1873
- हिंदी के कुछ इतिहास ग्रन्थ अंग्रेजी भाषा में भी लिखे गए हैं , जैसे -
- ↳ "ए स्केच ऑफ़ हिंदी लिटरेचर "
- ↳ लेखक --एडविन ग्रीव्ज़ महोदय ,
- ↳ प्रकाशन वर्ष ----1917
- ↳ " ए हिस्ट्री ऑफ हिंदी लिटरेचर "
- ↳ लेखक - एफ ई के महोदय
- ↳ 1920
- इसी कड़ी में डॉ बच्चन सिंह का लिखा हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास का नाम आता है। इन्होंने आदिकाल को आदिकाल न बोलकर अपभ्रंशकाल, जातीय साहित्य का उदय कहकर सम्बोधित किया।
- डॉ रामविलास शर्मा ने मार्क्सवादी - समाजवादी दृष्टि से हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा है।
- वर्ष 1848 में मौलवी करीमुद्दीन ने तजकिरा ई शुअराई हिंदी नामक हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा था।
- आचार्य शुक्ल के बाद का सर्वाधिक चर्चित इतिहास आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का माना जाता है जिन्होंने 1940 में हिंदी साहित्य की भूमिका, 1952 में हिंदी साहित्य ; उद्भव और विकास तथा हिंदी साहित्य का आदिकाल नाम से इतिहास की रचना की है।
- आचार्य द्विवेदी ने आचार्य शुक्ल की कई मान्यताओं पर असहमति जताते हुए उन पर अपनी दृष्टि से विचार किया है। आचार्य द्विवेदी ने परम्परा के आधार पर अपनी आलोचना पद्धति स्थापित की है।
- आचार्य रामकुमार वर्मा ने वर्ष 1938 में हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास नामक इतिहास ग्रंथ लिखा जिसमें लेखक ने भक्तिकाल तक का ही इतिहास लेते हुए 693 ई से 1693 ई तक का ही विश्लेषण किया है और हिंदी साहित्य का आरंभ 693 ई माना है।
- ये इतिहास ग्रंथ सात प्रकरण में बटा है।
- स्वयंभू को हिंदी का पहला कवि मानने वाले रामकुमार वर्मा ही हैं
- हिंदी साहित्य का वृहद इतिहास नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा 16 खंडों/भागों में प्रकाशित करवाया गया। इसी का छठा, दसवां, पंद्रहवाँ खंड/भाग डॉ नगेन्द्र द्वारा संपादित किया गया।
- अन्य प्रमुख इतिहास ग्रंथ------
- हिंदी साहित्य (डॉ धीरेंद्र वर्मा)
- राजस्थानी भाषा व साहित्य (डॉ मोतीलाल मेनारिया)
- आधुनिक हिंदी साहित्य (नंददुलारे वाजपेयी)
- हिंदी साहित्य: बीसवीं शताब्दी (नंददुलारे वाजपेयी)
- हिंदी साहित्य का अतीत (विश्वनाथ प्रसाद मिश्र)
- हिंदी काव्यधारा (राहुल सांकृत्यायन)
- हिंदी साहित्य विमर्श (पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी)
- कविता कौमुदी (रामनरेश त्रिपाठी)
- हिंदी कोविद रत्नमाला(श्यामसुंदर दास)
- हिंदी काव्यशास्त्र का इतिहास(भागीरथ मिश्र)
- हिंदी साहित्य का इतिहास (डॉ नगेन्द्र)
- हिंदी साहित्य और संवेदना का इतिहास (डॉ रामस्वरूप चतुर्वेदी)
- हिंदीसाहित्य का विवेचनात्मक इतिहास( सूर्यकांत शास्त्री)
- खड़ीबोली हिंदी साहित्य का इतिहास( ब्रजरत्न दास)
- ब्रज माधुरी सार (वियोगी हरि)
- हिंदीसाहित्य का दूसरा इतिहास ( डॉ बच्चन सिंह)
- हिंदी साहित्य का आधा इतिहास (सुमन राजे)
- हिंदी साहित्य का मौखिक इतिहास (नीलाभ)
- हिंदीसाहित्य का ओझल नारी इतिहास (नीरजा माधव)
- मॉडर्न हिंदी लिटरेचर( डॉ इंद्रनाथ मदान)
- हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास(गणपतिचंद्र गुप्त)
- साहित्य का इतिहास दर्शन(नलिन विलोचन शर्मा)
हिन्दी साहित्य का कालविभाजन व नामकरण -
हिंदीसाहित्य के आरंभिककाल को जॉर्ज ग्रियर्सन ने चारणकाल नाम देते हुए इसकी समय सीमा 700 से 1300 ई मानी व इसमें अंतर्गत 9 कवियों को स्थान दिया जो निम्नांकित हैं---
1 पुष्यकवि
2 खुमाण
3 कुमारपाल
4 केदारभट्ट
5 अनन्य दास
6 चंदवरदाई
7 शारंगधर
8 जोधराज
9 जगनिक
ग्रियर्सन ने इस समय के साहित्य का नामकरण चारणकाल, मुगलकाल, महारानी विक्टोरिया के शासन में हिंदुस्तान, कम्पनी के शासन में हिंदुस्तान आदि नामों से किया
मिश्रबन्धुओं का कालविभाजन व नामकरण
1 प्रारंभिक काल (700-1444 विक्रमी संवत)
2 माध्यमिक काल (1445 - 1680 वि स)
3 अलंकृतकाल (1681-1889 वि स )
4 परिवर्तन काल (1890 से 1924 विक्रम संवत)
5 वर्तमान काल (1926 विक्रम संवत से वर्तमान तक)
आचार्य शुक्ल का नामकरण व कालविभाजन
1 वीरगाथाकाल (1050 से 1375 विक्रमी संवत)
2 पूर्वमध्यकाल या भक्तिकाल (1375 से 1700 वि स )
3 उत्तरमधकाल या रीतिकाल (1700 से 1900 )
4 आधुनिक काल या गध्यकाल (1900 से 1984 वि स)
डॉ नगेन्द्र का कालविभाजन व नामकरण
1 आदिकाल - सातवी शती के मध्य से चौदहवीं शती के मध्य तक
2 भक्तिकाल - चौदहवीं शती के मध्य से सत्रहवीं शती मध्य तक
3 रीतिकाल - 17 वीं शती मध्य से 19 वीं शती मध्य तक
4 आधुनिक काल - 19 वीं शती के मध्य से अबतक
भारतेंदुकाल या पुनर्जागरण काल -1857 से 1900 ई
द्विवेदी युग या जागरण सुधारकाल - 1900 से 1918 ई
छायावाद -1918 से 1938 ई
प्रगतिवाद -1938 स 1943 ई
प्रयोगवाद - 1943 से 1953 ई
नवलेखनकल - 1953 से अब तक
आदिकाल का नाम व नामकरणकर्ता
1 चारणकाल-------------------जॉर्ज ग्रियर्सन
2 संधि व चारणकाल ---------रामकुमार वर्मा
3 सिद्ध व सामंतकाल --- ---- राहुल सांकृत्यायन
4 प्रारंभिक काल ---------------मिश्रबन्धु
5 बीजवपनकाल ---------------महावीरप्रसाद द्विवेदी
6 वीरकाल ----------------------विश्वनाथ प्रसाद मिश्र
7 आधार काल ------------------सुमनराजे
8 वीरगाथाकाल ---------------- आचार्य रामचंद्र शुक्ल
9 आदिकाल--------------------- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
10 अपभ्रंशकाल ----------------डॉ बच्चन सिंह
रीतिकाल व इसके नामकर्ता
1 रीतिकाव्य--------------- -------जॉर्ज ग्रियर्सन
2 अलंकृतकाल -------------------मिश्रबन्धु
3 श्रृंगारकाल---------------------- विश्वनाथप्रसाद मिश्र
4 कलाकाल -- --------------------रामशंकर शुक्ल रसाल
5 रीतिकाल ------------------------ रामचंद्र शुक्ल
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अपभ्रंश साहित्य
स्वयंभू को अपभ्रंश भाषा का प्रथम कवि माना जाता है जिनका समय 738ई लगभग माना जाता है
स्वयंभू को ही अपभ्रंश भाषा का वाल्मीकि व व्यास कहा जाता है साथ ही जैन साहित्य का भी प्रथम कवि माना जाता है
स्वयंभू की भाषा संधा भाषा कहलाती है जिसमे स्वयंभू ने तीन ग्रंथों की रचना की है
1 पउम चरिउ
2 रिट्ठनेमि चरिउ
3 स्वयम्भू छन्द
इनमें से पहले ग्रंथ को स्वयंभू के पुत्र त्रिभुवन ने पूर्ण किया जिसमे राम के चरित्र का वर्णन समाहित है।
स्वयंभू ने अपनी भाषा को देशी भाषा से सम्बोधित किया है।
पुष्य या पुण्ड्र को शिवसिंह सेंगर ने हिंदी का प्रथम कवि माना है तथा पुष्य को भाखा की जड़ कहा।
अनेक विद्वान पुष्य य पुंड्र को ही पुष्पदंत मानते हैं जिसका समय लगभग 927 ई माना जाता है।
पुष्पदंत को कविकुल तिलक, काव्यरत्नाकर, अभिमानमेरु आदि अन्य नामों से भी जाना जाता है। इन्हें हिंदी का भवभूति भी कहा जाता है।पुष्पदंत में ग्रन्थों में चौपाई छन्द का प्रयोग मिलता है।
पुष्पदंत के 3 ग्रन्थ मिले है
1 महापुराण
2 जस हर चरिउ
3 णयकुमार चरिउ
इनमें से महापुराण ग्रन्थ में 63 महापुरुषों के जीवन का चरित्र चित्रण किया गया है।
धनपाल दसवीं शती में अपभ्रंश के तीसरे प्रमुख कवि हैं जिन्होंने भविसयत्त कहा नामक ग्रंथ की रचना की।
जिनदत्त सूरी - जिनदत्त सूरी अपभ्रंश काल के कवि हैं जिन्होंने उपदेशरसायन रास नामक रास काव्य की रचना की जो 12 वीं शती में लिखित जैन रास काव्यपरंपरा का प्रथम ग्रन्थ माना जाता है, इसे ही अपभ्रंश भाषा का पहला रास काव्य भी कहते हैं। ये रचना नृत्य गीत रासलीला काव्य है।
शालिभद्र सूरी - शालिभद्र सूरी अन्य जैन कवि हैं जिनका महत्वपूर्ण जैन ग्रन्थ भरतेश्वर बाहुबली रास है । इसी जैन ग्रंथ द्वारा रास काव्यपरंपरा का हिंदी में प्रवर्तन माना जाता है।
अपभ्रंश काल में जैन कवियों के इतर किसी मुस्लिम रचनाकार द्वारा रचित पहला जैन धर्म इतर रासकाव्य संदेश रासक है जिसके रचनाकार अब्दुल रहमान हैं। संदेश रासक में विक्रमपुर की रानी के वियोग का वर्णन है, अतः यह एक प्रकार का खण्डकाव्य है।
मुनिरामसिंह-रामसिंह पाहुड़ दोहा नामक जैन ग्रन्थ के रचयिता हैं, ये रहस्यवादी कवि भी माने जाते हैं।
जोइन्दु-जोइन्दु को अपभ्रंश भाषा में दोहा काव्य का आरम्भकर्ता माना जाता है। इनके द्वारा दो ग्रंथों की रचना की गई - 1- परमात्म प्रकाश, 2 - योगसार। इनका समय लगभग छठी शताब्दी माना गया है
उपयोगी जानकारी। धन्यवाद।
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